शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के तहत जिले में कुल 161 निजी स्कूल पंजीकृत हैं। जहां इस साल पहले चरण में 621 बच्चों को ही एडमिशन मिल पाया है। शिक्षा विभाग के अनुसार पंजीकृत निजी स्कूलों में कुल 1953 सीटें निर्धारित है। इस लिहाज से 1332 सीटें अब भी खाली रह गई है।
इन सीटों पर एडमिशन प्रोसेस दोबारा शुरू हो पाएगी या नहीं, इस पर संशय की स्थिति है क्योंकि इस सत्र लॉटरी सिस्टम से एक ही बार लिस्ट जारी की गई है। सेकंड लिस्ट के लिए अब तक इंतजार हो रहा है। जबकि पहले से एडमिशन लेने वाले बच्चों की पढ़ाई जारी है। एडमिशन को लेकर आगे क्या होगा या सीटें खाली ही रहेगी, इस संबंध में बीईओ बसंत बाघ सहित शिक्षा विभाग के अन्य अफसरों से संपर्क किया लेकिन इस संबंध में कोई कुछ कहना नहीं चाह रहे हैं। दरअसल शासन स्तर का मामला है।जिला निजी प्राइवेट स्कूल संगठन एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष राधिका गुप्ता ने बताया कि आवेदन व पात्रता के आधार पर हर साल निजी स्कूलों में बच्चे एडमिशन लेते हैं। तय सीटों के अनुपात में कम बच्चों का प्रवेश हो पाया है। जिसे अफसर व निजी स्कूल प्रबंधन स्वीकार रहे हैं।
पिछले साल चौथे नंबर पर थे, इस बार रैंक जारी नहीं
शिक्षा का अधिकार के तहत गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने में पिछले साल दुर्ग संभाग के 5 जिलों में बालोद जिला चौथे नंबर पर यानी नीचे से दूसरे स्थान पर था। लेकिन इस बार संभाग स्तरीय रैंक जारी नहीं हुआ है। विभाग के रिकॉर्ड में प्रवेश के लिए अब तक विभागीय कार्रवाई जारी है। पिछले साल 164 निजी स्कूलों में नर्सरी से पहली तक के लिए 1729 सीटें निर्धारित की गई थी। जिसमें दो चरण में प्रवेश देने के बाद भी 715 सीटें खाली रह गई थी। विभागीय अफसरों का तर्क रहता है कि निर्धारित सीट की तुलना में हर साल आवेदन ही कम आते हैं। इसलिए सभी सीटों में एडमिशन हो पाएगा या नहीं। यह बाद में मालूम होगा। फिलहाल पिछले साल की तुलना में इस बार एडमिशन लेने वाले बच्चों की संख्या 369 कम है। विभाग के रिकॉर्ड अनुसार पिछले सत्र में 990 बच्चे एडमिशन लिए थे। आंकड़े बढ़ेंगे या यथावत रहेंगे, इस संंबंध में विभागीय अफसर कुछ कह नहीं पा रहे हैं।
पिछले साल पहले चरण में ही 1231 आवेदन मिले थे
विभागीय जानकारी अनुसार पिछले साल पहले चरण में प्रवेश के लिए 1231 आवेदन आए थे। जिसके बाद जुलाई में ही पहली लॉटरी में 994 बच्चों का चयन किया गया था। लेकिन सभी का एडमिशन नहीं हो पाया।शिक्षा विभाग को निजी स्कूलों से जानकारी मिली थी कि 4 बच्चे के पालकों से जब संपर्क किया गया तो दूसरे स्कूल में पढ़ाने की बात कही यानी यहां पढ़ाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
वर्ष 2018 में 681, 2019 में 1016 सीटों पर प्रवेश
बालोद जिले में शिक्षा के अधिकार के तहत आरक्षित सीटों में हर साल 500 से ज्यादा बच्चे एडमिशन लेते है। शैक्षणिक सत्र 2018 में 681, 2019 में 1016 सीटें भरी थी। इस लिहाज से वर्ष 2018 व वर्ष 2019 की तुलना में इस बार कम बच्चों का प्रवेश हो पाया है। हालांकि स्कूलों से वास्तविक आंकड़े आने के बाद स्थिति बदल सकती है। ऐसा विभागीय कर्मचारी कह रहे हैं।
नियमों का रोड़ा इसलिए भी पालक नहीं लेते रुचि
शिक्षा विभाग के अनुसार नियमानुसार ही बच्चों को प्रवेश मिलता है लेकिन पालक वर्ग देरी व नियमों के चलते शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद किसी भी स्कूल में एडमिशन करा देते है, भले ही फीस देना पड़ें। दबी जुबान निजी स्कूल के संचालक, शिक्षक, विभागीय अफसर भी कहते आ रहे है कि हेड कार्यालय स्तर से ही विभागीय प्रोसेस कंपलीट होने में समय लगता है। जिसका असर दिखता है। पिछले साल निजी स्कूलों को लाॅटरी में चयनित बच्चों के सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन करने के निर्देश दिए गए थे। निजी स्कूलों ने पहले एक से तीन किलोमीटर के दायरे में आने वाले बच्चों के निवास को देखा जाता हैं कि जहां का निवास प्रमाण पत्र दिया है वहां रहते हैं या नहीं। उसके बाद बीपीएल कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेज का वेरिफिकेशन किया जाता है। यदि किराए में रहते हैं तो भी जांच की जाएगी।

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