नगर निगम भिलाई के तीन कार्यकाल में हर बार करीब 50 फीसदी पार्षद ऐसे रहे, जिन्हें दोबारा परिषद तक पहुंचने के लिए जगह नहीं मिली। वर्ष 2005 के चुनावों में भाजपा-कांग्रेस समेत निर्दलीय 44 सिटिंग पार्षद वर्ष 2010 के चुनावों में मैदान से बाहर हो गए। इसी तरह वर्ष 2015 में नए चेहरे के रूप में जीतने वाले 46 पार्षद वर्ष 2015 में पार्षद नहीं बन पाए।
वर्ष 2005 में भिलाई निगम में पार्षद पद की संख्या 67 थी। वर्ष 2010 के चुनाव में परिसीमन के बाद एक सीट बढ़कर संख्या 68 हो गई। वर्ष 2015 के चुनावों में तीन सीटें बढ़ीं और 70 सीटों के लिए चुनाव हुए। बाद के चुनाव में राजनीतिक दलों ने ही अपने सिटिंग पार्षदों को चेहरों को मौका दिया। इसके चलते वर्ष 2010 के निकाय चुनावों मेंं बीजेपी के 27 और कांग्रेस 12 पार्षद चेहरे बदल गए। जबकि वर्ष 2015 के चुनाव में कांग्रेस के 22 और बीजेपी के 21 सीटिंग पार्षद चुनावी मैदान से बाहर हो गए।
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दो बार चुनाव जीतकर सदन में पहुंचे 12 पार्षद
भिलाई नगर निगम के कार्यकाल में लगातार दोबारा चुनाव जीतने वाले भाजपा-कांग्रेस और निर्दलीय समेत कुल 12 पार्षद सदन में पहुंचे। वर्ष 2005 और 2010 के चुनाव में भाजपा के केवल एक ही पार्षद रहे। जबकि कांग्रेसी पार्षदों की संख्या तीन रही। निर्दलीय पार्षदों की संख्या सर्वाधिक 6 रही। वर्ष 2015 के चुनावों में इन्हें जीत नसीब नहीं हो सकी। इसके चलते कांग्रेस से दो पार्षद अगले चुनाव में हार गए। चार निर्दलीय भी हैं जो दोबारा जीतकर आए। उनकी जीत का क्रम अब भी जारी है।
वर्ष 2005 से 9 पार्षद लगातार तीन बार जीते
भिलाई निगम के चार वर्ष के कार्यकाल में भाजपा-कांग्रेस समेत कुल निर्दलीय पार्षद ऐसे भी रहे, जो निगम के गठन के बाद से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। इसमें भाजपा पार्टी की टिकट पर जीत दर्ज करने वाले पार्षदों की संख्या दो है। जबकि कांग्रेस की ओर से तीन पार्षद हर बार सदन में पहुंचने में कामयाब रहे। जबकि पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय होकर तीन चेहरों ने हेट्रिक की। जबकि एक निर्दलीय भी ऐसे रहे, जो लगातार जीतते आ रहे हैं। उनके जीत का क्रम लगातार जारी है।
6 पार्षदों ने पत्नियों के सहारे तय किया रास्ता
निकाय चुनावों में परिसीमन का फैक्ट भी दावेदारों को दोबारा टिकट दिलाने से लेकर उनकी जीत-हार को काफी प्रभावित करता है। इसके चलते एक चुनाव में पुरुष सीट होने पर खुद चुनाव लगने वाले 6 पार्षदों ने वर्ष 2005 से लेकर 2015 तक का चुनावी सफर पत्नी को आगे करके लड़ा। इसमें भाजपा और कांग्रेस के दो-दो पार्षदों ने जीत दर्ज की। जबकि चार पार्षद ऐसे रहे, जिन्हें पार्टी ने पत्नी के नाम पर टिकट नहीं दी तो पत्नी के सहारे निर्दलीय मैदान में उतरे और जीत हासिल की।

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