वर-वधु के खून की जांच कर टाला जा सकता है थैलेसीमिया का खतरा  - अंतरराष्ट्रीय थैलेसीमिया दिवस पर होंगे जागरुकता के प्रयास
त्वरित ख़बरें/राजनांदगांव, 07 मई 2022.

खून से जुड़ी बीमारी थैलेसीमिया पर नियंत्रण हेतु इस विषय में जनजागरुकता के लिए जिले में विभिन्न प्रेरक कार्यक्रम आयोजित किए जाए

इस दौरान बैनर-पोस्टर व माइकिंग के साथ ही विभिन्न प्रचार माध्यमों से लोगों को थैलेसीमिया के कारण, लक्षण तथा इससे बचाव से संबंधित उपायों की जानकारी दी जाएगी। वहीं अस्पताओं में स्वास्थ्य जांच शिविर भी लगाए जाएंगे।

स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी प्रयासों के क्रम में हर वर्ष 8 मई को अंतरराष्ट्रीय थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष ‘वी अवेयर शेयर एंड केयर’ थीम पर थैलेसीमिया दिवस मनाया जाएगा। इस दौरान जागरुकता कार्यक्रमों के माध्यम से यह प्रचारित किया जाएगा कि थैलेसीमिया खून से जुड़ी बीमारी है जिसके कारण शरीर में खून की कमी हो जाती है। यह अनुवांशिक रोग की श्रेणी में आता है जो बच्चों के भीतर उनके माता-पिता से होती है। थैलेसीमिया हीमोग्लोबिन बनाने वाली कोशिकाओं के डीएनए में हुए नए परिवर्तनों के कारण होता है। यह दो प्रकार की होती है मेजर थैलेसीमिया और ट्रेट थैलेसीमिया। इस बीमारी के लक्षण बच्चों में 6 से 8  महीने के अंदर नजर आने लगते हैं। इस बीमारी से राहत पाने के लिए वर्तमान में बोन मैरो ट्रांसप्लांट या पीड़ित बच्चों को ब्लड ट्रांसफ्यूजन ही उपयुक्त उपचार माना जाता है। 

इस संबंध में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मिथिलेश चौधरी ने बतायाः “थैलेसीमिया एक जटिल रोग है जिसके विषय में जनजागरुकता के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। थैलेसीमिया दिवस पर अस्पतालों में स्वास्थ्य जांच शिविर लगाए जाएंगे, जिसमें विशेषज्ञ चिकित्सक सेवाएं देंगे। सामान्यतः महिलाओं एवं पुरुषों के शरीर में क्रोमोजोम की खराबी माइनर थैलेसीमिया होने का कारण बनती है। यदि दोनों ही मानइर थैलेसीमिया से पीड़ित होते हैं तो शिशु को मेजर थैलेसीमिया होने की संभावना बढ़ जाती है। जन्म के तीन महीने बाद ही बच्चे के शरीर में खून बनना बंद हो जाता है और उसे बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है, लेकिन थैलेसीमिया के कारण लाल रक्त कणों की उम्र कम हो जाती है। इस कारण बार-बार शिशु को बाहरी रक्त चढ़ाना पड़ता है।”

आगे उन्होंने बतायाः “जन्म के पांच महीने के बाद यदि माता-पिता को महसूस हो कि शिशु के नाखून और जीभ पीले हो रहे हैं, बच्चे के जबड़े और गाल असामान्य हो गए हैं, शिशु का विकास रुकने लगा है, वह अपनी उम्र से काफी छोटा नजर आने लगे, चेहरा सूखा हुआ रहे, वजन न बढ़े, हमेशा कमजोर और बीमार रहे, सांस लेने में तकलीफ हो और पीलिया या जॉइंडिस का भ्रम हो तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। ये लक्षण थैलेसीमिया के भी हो सकते हैं। यदि जांच के बाद थैलेसीमिया की पुष्टि हुई तो बोन मेरो ट्रांसप्लांट द्वारा शिशु के जीवन को सुरक्षित किया जा सकता है। इसके साथ ही गर्भ में पल रहे शिशु की सही समय पर जांच करानी चाहिए।” 

थैलेसीमिया पर नियंत्रण के तरीके 

इस रोग को दो तरीके से रोका जा सकता है। शादी से पहले वर-वधु के रक्त की जांच की जा सकती है क्योंकि यदि जांच में दोनों के रक्त में माइनर थैलेसीमिया मिला तो बच्चे को मेजर थैलेसीमिया होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में मां के 10 सप्ताह तक गर्भवती होने पर पल रहे शिशु की जांच की जानी चाहिए जिससे गर्भ में पल रहे बच्चे में थैलेसीमिया की बीमारी का पता लगाया जा सकता है। दूसरा उपाय है, यदि विवाह के बाद माता-पिता को पता चले कि शिशु थैलेसीमिया से पीड़ित है तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट पद्धति से शिशु के जीवन को सुरक्षित किया जा सकता है।

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