मैं बस्तर की मिट्टी हमेशा सबके लिए अनमोल रही हूँ।
वनों से आच्छादित मैं हवाओं में सांसें घोल रही हूँ।
ना जाने कितने दर्द सहे मैंने पर आज बोल रही हूँ।
मेरे इस धरा पर रोज खेले जाते हैं खूनी होली।
कहीं जवान तो कहीं निर्दोष आदिवासी को लगती है गोली।
आखिर कौन सुनेगी मेरी आवाज फिर भी आज बोल रही हूं।
मैं बस्तर की मिट्टी हमेशा सबके लिए अनमोल रही हूं।।
सजते होंगे होली में रंगोली तुम्हारे घर आंगन में।
मेरी तो आँसू नही पोछे जा रहे है खून से भीगे दामन में।
नंगाड़े मेरे भोले वनवासी भी बजाते पर डर बैठी है मन में।
कभी मुखबिर तो कभी संगम सदस्य बताकर मार दिए जाते है बन्दूक वाले रन में।
आखिर सड़क से संसद तक कौन पहुंचाये मेरी आवाज दबी हुई हैं जो मन में।
मैं विकास के रास्ते बैलाडीला,रावघाट,किरंदुल से खोल रही हूँ।
मैं बस्तर की मिट्टी हमेशा सबके लिए अनमोल रही हूं।
लोगों ने इस बस्तर को धरा का स्वर्ग कहा।
जहाँ छत्तीसगढ़ के भांचा राम स्वयं रहा।
वेरियर एल्विन ने तो इसकी कहानी सारे जग में कहा।
चित्रकोट तीरथगढ़ और कोटोम्सर सी सुंदरता है जहाँ।
अब भी यहाँ सीता रो रही है पर गीदम का वो गिद्धराज जटायु है कहाँ।
बिछाई मेरी धरा पे लैंडमाइंस और बारूद से लदफद होली खेल रही हूँ।
मैं बस्तर की मिट्टी.......
कब होली कब दीवाली हम कैसे गिने।
हमारे लिए तो यही जंगल है मक्का और मदीने।
आग सीने में खूनी रंग में रंगे जंगल को देख जल रही है।
डर लगता है हर पेड़ के पिछे मानो बंदूक चल रही है।
मैं पूछती हूँ आदिवासियों पर हो रही ये आतंक क्या सही है।
मेरे आदिवासी कोई पुलिस मुखबिर या संगम सदस्य नही है।
बस्तर में जो हो रहा है वो किसी भी मायने में सही नही है।
आज अपनी इस दृश्य को देख अतीत को तौल रही हूँ।
मैं बस्तर की मिट्टी हमेशा सबके लिए अनमोल रही हूं।
गुंडाधूर की इस धरा पर लोग कैसे हैं मजबूर।
न्याय की गोहार लगाते सिलगेर,गमपुर और सारकेगुड़ा है दूर।
जहाँ बीज पंडुम की त्यौहार पर गोली दागी गई क्रूर।
कैसे मनाये हम होली हमारे उत्सव छिन लिए गये हम है मजबूर।
मैं दंतेश्वरी देख रही हूँ जहाँ बढ़ रहे लाल आतंक का असूर।
मैं इस लाल आतंक का विरोध करने तुम्हें ही दुर्गा और काली बनने बोल रही हूं।
मैं बस्तर की मिट्टी हमेशा सबके लिए अनमोल रही हूँ।
बदल गये सदियों ज़माने पर आज भी मैं वहीं हूँ।
मुझे चमक-धमक नही चाहिए मैं इन आदिवासियों के बीच ही सही हूँ।
लिखे दुलरवा कलम बस्तर पर क्यों नही सुनती सरकार हमारी? क्या मैं इस छ.ग. की वासी नही हूँ।।
दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा
दुर्रे बंजारी "छुरिया"

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