दुर्ग जिले में किसान किताब के लिए भटक रहे आम लोग परेशान है करीब 5 माह से जिले में किसान किताब की कमी है लगभग सभी पटवारी के हल्कों में सैकड़ों किसान किताब की आवश्यकता है लेकिन किसान किताब उपलब्ध नहीं हो रहा है कुछ किसान किताब जिले में आई थी जिसे सभी पटवारी ने आपसी सहमति बना आपस मे 15 – 15 किसान किताब बाट लिया। लेकिन जरूरत सैकड़ों की हो और उपलब्धता सुनिश्चित नही था तो
इस कहावत का इस्तेमाल इस तरह से किया ।
*अंधा बांटे रेवड़ी……. के दे।
अंधा बांटे रेवड़ी, फिर फिर अपने को दे’ एक कहावत है, जिसका मतलब है कि कोई व्यक्ति ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा अपने करीबी लोगों को पहुंचाना चाहता है. इसका मतलब यह भी होता है कि अधिकार मिलने पर अपने ही लोगों का फ़ायदा करना यानी स्वार्थ-लाभ, खुद उठाना*
पटवारीयो द्वारा प्रभावशाली लोगों या अपने स्वार्थ हित में चेहरे देखकर लोगों को अपने मनपसंद लोगों को किसान किताब बनाकर दे दी गई लेकिन नामांतरण की पंजी की रजिस्टर की सीरियल के हिसाब से किसान किताब नहीं बना जिसके कारण आज सैकड़ों लोगों किसान किताब से वंचित हैं।
कलेक्टर दुर्ग को भी कई बार इस समस्या से अवगत कराया गया था ।
किसान किताब नहीं होने के कारण ना तो रजिस्ट्री हो पा रही है ना लोगों को मकान बनाने के लिए भवन अनुज्ञा प्राप्त हो रही है ना लोगों का सीमांकन हो रहा है ना ही लोगों को बैंक से लोन प्राप्त हो रहा है

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