धान-चावल की राखियों से बदल रही महिलाओं की तकदीर, आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बना बलौदा बाजार
बलौदा बाजार। जिस धान के पैरा (पराली) को कभी बेकार समझकर फेंक दिया जाता था, वही अब ग्रामीण महिलाओं की आय का नया जरिया बन गया है। जिला प्रशासन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) की पहल ने महिलाओं के हुनर को नया मंच दिया है। अब बलौदा बाजार के ग्राम लाहोद की करीब 150 महिलाएं धान के पैरा, धान और चावल के दानों से आकर्षक राखियां, बैज और सजावटी आर्ट उत्पाद तैयार कर आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम बढ़ा रही हैं।
रक्षाबंधन और स्वतंत्रता दिवस को ध्यान में रखते हुए महिलाओं ने बड़े पैमाने पर राखियां और बैज बनाना शुरू कर दिया है। खास बात यह है कि जिला प्रशासन इन उत्पादों की बिक्री की भी व्यवस्था कर रहा है, ताकि महिलाओं को उनके हुनर का उचित लाभ मिल सके और उनकी आय में बढ़ोतरी हो।
प्रशिक्षण प्राप्त महिलाओं का कहना है कि पहले घर की जिम्मेदारियों के कारण उनके पास आय का कोई साधन नहीं था। अब वे घरेलू कामकाज पूरा करने के बाद खाली समय में राखियां, बैज और पैरा आर्ट तैयार कर रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि आगामी त्योहारों में इन उत्पादों की अच्छी बिक्री होगी, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
महिलाओं ने खुशी जताते हुए कहा कि जिस पैरा को पहले बेकार समझकर फेंक दिया जाता था, वही आज उनकी मेहनत और रचनात्मकता के दम पर कमाई का साधन बन गया है। उन्होंने इस पहल के लिए शासन और जिला प्रशासन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह योजना ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भर बनने का सुनहरा अवसर साबित हो रही है।
जनपद पंचायत बलौदा बाजार के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एफ.सी. पटेल ने बताया कि ग्राम लाहोद में 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसमें लगभग 150 महिलाओं ने पैरा आर्ट के साथ-साथ धान और चावल से राखियां बनाने की तकनीक सीखी। उनका कहना है कि यह पहल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ स्थानीय कला और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को भी बढ़ावा दे रही है।
रक्षाबंधन के इस सीजन में बलौदा बाजार की ये अनोखी धान-चावल की राखियां सिर्फ भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं होंगी, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की मेहनत, आत्मनिर्भरता और बदलती सोच की भी पहचान बनेंगी।