पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर की राजनीति में एक बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रहीं सुष्मिता देव के इस्तीफे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। उनके इस्तीफे के बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ हुई मुलाकात ने इस चर्चा को और हवा दे दी है कि वह जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम सकती हैं। हालांकि सुष्मिता देव ने अभी तक अपनी अगली राजनीतिक पारी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन जिस तरह से घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा है, उससे अटकलों का बाजार गर्म है।
सुष्मिता देव लंबे समय से पूर्वोत्तर की राजनीति का बड़ा चेहरा रही हैं। कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में शामिल होने के बाद उन्हें पार्टी ने राज्यसभा भेजा था और पूर्वोत्तर राज्यों में संगठन विस्तार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी थी। ऐसे में उनका अचानक पार्टी छोड़ना टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ रही असंतुष्टि का संकेत भी हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा हिमंत बिस्वा सरमा से उनकी मुलाकात की हो रही है। हिमंत सरमा को बीजेपी का मजबूत रणनीतिकार माना जाता है और उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर में भाजपा का जनाधार मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में सुष्मिता देव से उनकी मुलाकात को साधारण राजनीतिक शिष्टाचार नहीं माना जा रहा। सूत्रों का दावा है कि दोनों नेताओं के बीच भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को लेकर चर्चा हुई है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सुष्मिता देव का राजनीतिक सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष मोहन देव की बेटी हैं और कांग्रेस के टिकट पर सांसद रह चुकी हैं। महिला अधिकारों और सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। लेकिन कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने टीएमसी का दामन थाम लिया था। अब एक बार फिर उनके नए राजनीतिक ठिकाने को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
यदि सुष्मिता देव बीजेपी में शामिल होती हैं, तो इसका असर केवल असम तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी इसके राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे। बीजेपी इसे विपक्षी दलों के कमजोर होते जनाधार के रूप में पेश कर सकती है, जबकि टीएमसी के लिए यह एक बड़े संगठनात्मक नुकसान के रूप में देखा जाएगा।
फिलहाल सियासत के जानकारों की नजर सुष्मिता देव के अगले कदम पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यदि वह भाजपा में शामिल होती हैं तो यह पूर्वोत्तर की राजनीति में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। वहीं टीएमसी के लिए यह संदेश भी होगा कि पार्टी के भीतर असंतोष को नजरअंदाज करना भविष्य में और महंगा पड़ सकता है। कुल मिलाकर, सुष्मिता देव का इस्तीफा और हिमंत सरमा से मुलाकात आने वाले दिनों की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है।