नियमों की अनदेखी से जल्द ही करोड़ों टन गंदगी का पहाड़ लगेगा
भिलाई/ प्लास्टिक कचरे की भीषण समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में स्वच्छ भारत अभियान के तहत कुछ स्पष्ट नियम कायदे बनाए थे। यह बिल्कुल स्पष्ट था कि ऐसा प्लास्टिक कचरा जिसको फिर से इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता है उसे आरडीएफ अर्थात रिफ्यूज्ड व्युत्पन्न इंधन माना जाएगा। इस प्रकार का आरडीएफ सभी बड़े औद्योगिक इकाइयों को इंधन के रूप में इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा। ऐसे सभी संयंत्र जहां इंधन के रूप में डीजल,पेट्रोल,बिजली अथवा कोयले का उपयोग किया जाता है। वहां अपनी कुल आवश्यकता का कम से कम 5% अनिवार्य रूप से आरडीएफ का इस्तेमाल करना होगा। पर्यावरण विभाग से सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार आरडीएफ को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने के विषय में क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी, दुर्ग के क्षेत्राधिकार में किसी प्रकार की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। जबकि 2016 के नियमानुसार 6 महीने के अंदर सभी औद्योगिक इकाइयों को इस विषय में अनिवार्य रूप से काम कर लेना चाहिए था। कार्य पर्यावरण विभाग को करवाना था। लेकिन दुर्ग जिले में कहीं भी कोई उद्योग इस नियम के तहत काम नहीं कर रहे है। हालात ऐसे हैं कि भिलाई इस्पात संयंत्र की जहां सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, वहां कचरा उठाने के नाम पर ठेके में काम करवाया जाता है। जबकि उसके विनिष्टीकरण और आरडीएफ के भावी इस्तेमाल के लिए भिलाई इस्पात संयंत्र के पास कोई योजना नहीं है। संयंत्र द्वारा निर्मित एसएलआरएम सेंटर में रीसाइकलिंग प्लांट लगाया गया है। किंतु वहां भी यह काम इसलिए बंद पड़ा है क्योंकि रीसाइकलिंग के योग्य प्लास्टिक संयंत्र द्वारा उपलब्ध नहीं कराया जाता। साथ ही अधिकृत एजेंसी को हर प्रकार के प्लास्टिक कचरे को खरीदने का दबाव बनाया जाता है। इसी प्रकार अन्य कई बड़े कारखानों के द्वारा भी नियमो की खुली अनदेखी की जा रही है। दुर्ग नगर निगम सहित भिलाई और वैशाली नगर निगम में जिस बेतरतीबी से कचरे की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। उससे जल्द ही जिले में करोड़ों टन प्लास्टिक का अंबार अलग अलग जगह जमा हो जाएगा। फिलहाल या तो आरडीएफ को गड्ढा खोदकर दबाया जा रहा है या फिर आग लगाई जा रही है। दुर्भाग्य से नगर निगमों के नेता केवल स्वार्थ और फायदे की राजनीति के चलते आपस में एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। एसएलआरएम सेंटर के विषय में भी लोगों को विशेष जानकारी ही नहीं है। दरअसल वह स्थान जहां शहरी कचरे का निष्पादन और पुनर्चक्रीय विधि से उसे इस्तेमाल के लायक बनाने की प्रक्रिया की जाती है, उसे एसएलआरएम सेंटर कहा जाता है। जबकि भिलाई–दुर्ग में ऐसी कहीं कोई व्यवस्था नहीं है। जिस स्थान पर कूड़ा कचरा इकट्ठा किया जाता है उसे ही एसएलआरएम सेंटर बता दिया जाता है। विशेष जिम्मेदारी भिलाई इस्पात संयंत्र के साथ साथ आसपास के सभी सीमेंट प्लांट की भी बनती है। क्योंकि नियमानुसार वर्ष 2016 तक ही संयंत्र प्रबंधन को आरडीएफ और प्लास्टिक कचरे के इस्तेमाल की संपूर्ण व्यवस्था कर लेनी चाहिए थी। किंतु संयंत्र प्रबंधन द्वारा आज तक इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास न किया जाना सिर्फ भिलाई ही नहीं बल्कि पूरे जिले के लिए बेहद गंभीर समस्या है। इस विषय पर सामाजिक और राजनितिक कार्यकर्ता उच्च न्यायालय की शरण में जाने के विकल्प तलाश रहे हैं। पर्यावरण विभाग द्वारा लिखित प्रदान किए गए जवाब से यह स्पष्ट हो चुका है कि औद्योगिक इकाइयां पर्यावरण विभाग के साथ मिलीभगत कर केवल आम जनता को नुकसान पहुंचा रही हैं। पर्यावरण विभाग की आपराधिक लापरवाही और बड़े-बड़े संयंत्रों द्वारा नियमो की गंभीर अनदेखी भविष्य में इस संबंध में बड़े आंदोलन की भी संभावना तैयार कर रही है।