ये मैं हूं:पढ़ाई और आजादी के लिए पिता से लड़ी, फिर सम्मान के लिए 'सपनों के राजकुमार' से करनी पड़ी जंग
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नई दिल्ली  १६ अप्रैल 

हरियाणा के एक ऐसे शहर में जन्मीं जहां, लड़कियों का बोलना, बाहर निकलना, लोगों के बीच उठना-बैठना और अपनी ख्वाहिशें जाहिर करना सही नहीं माना जाता। बमुश्किल 12वीं तक पढ़ने दिया जाता और फिर शादी कर दी जाती। इसके बाद सम्मान मिले या अपमान बस शादी निभाने में ही जिंदगी खत्म हो जाती, लेकिन बचपन से बेहद स्पष्टवादी स्वभाव की अनीता भारद्वाज को ऐसी जिंदगी कतई मंजूर न थी। वे अपनी पढ़ाई और पसंद के लिए लड़ी, लेकिन जब बात आत्मसम्मान की आई तो सब एक झटके में छोड़ दिया। अब बच्चों को शिक्षा का पाठ पढ़ाने के साथ ही औरतों के दर्द को शब्द दे रही हैं। बेटियों के लिए लिखी गईं उनकी सोहर आज हरियाणा के घरों में गूंजती हैं। पढ़िए- पश्चिमी दिल्ली में रहने वाली अनीता भारद्वाज की कहानी, उन्हीं की जुबानी...

मैं हरियाणा के रोहतक जिले के छोटे से शहर महम में जन्मीं। यहीं पली-बढ़ी और 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। उस वक्त हमारे शहर में लड़कियों को बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी। गांव पड़ोस तो दूर घर में आने वाले पुरुष मेहमानों के सामने भी नहीं आना होता था। उन्हें चाय-पानी देने से लेकर खाना परोसने तक का काम घर के पुरुष या फिर मां और दादी का होता था, घर की लड़कियों का नहीं। मैं बचपन से ही थोड़ी बागी और स्पष्टवादी थी। अगर कोई बात ऐसी होती, जो रास नहीं आती तो स्पष्ट शब्दों में उसका विरोध करती। घरवालों की लाडली थी, इसलिए मुझे कभी इस बात के लिए सजा नहीं दी गई।

पढ़ाई के लिए पकड़ी जिद, दादी-बुआ ने दिया साथ
12वीं करते ही घर में मेरी शादी के लिए हल्ला मचने लगा, लेकिन मैं आगे पढ़ना चाहती थी। बाहर निकल कर नौकरी करना चाहती थी। अपने-अपने छोटे सपने पूरा करना चाहती थी। जब मैंने आगे पढ़ाई करने की जिद पकड़ी तो दादी, चाचा और बुआ ने मेरा साथ दिया। मेरी बुआ दिल्ली में रहती हैं। उन्होंने पापा को मनाया कि मैं उनके यहां रहकर पढ़ाई पूरी कर सकूं। पापा राजी हो गए और मैं साल 2009 में खुले आसमान में उड़ने की चाहत लिए दिल्ली आ गई। यहां से आगे की पढ़ाई पूरी की।

गांव की छोरी ने किताबों को बनाया दोस्त
मैं कभी घर से निकलकर बाजार भी नहीं गई थी। मुझे जो चाहिए होता था, वो सब घर पर ही मिलता था। ऐसे में जब दिल्ली आई तो दो घंटे का रास्ता तय कर कॉलेज जाना फिर लौट कर आना पहाड़ सी चुनौती थी। बस में धक्का-मुक्की होती। मैं रास्ते भटक जाती। यहां सबके पास स्मार्टफोन होते थे और मेरे पास कीपैड। हिंदी मीडियम से पढ़ी थी। रहन-सहन और भाषा भी गांव का था, इसलिए नए लोगों से मिलने-जुलने में बड़ी झिझक होती थी। मैं आगे से बात करने की कोशिश करती और अगर कोई हंस पड़ता तो फिर कुछ बोलने का कॉन्फिडेंस ही नहीं रहता। ऐसी स्थिति से बचने के लिए मैं अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त किताबों के साथ गुजारती थी। परीक्षा दी और मेरे नंबर अच्छे आए तो नोट्स के लालच में ही सही मेरे भी दोस्त बन गए। धीरे-धीरे मैंने अपनी पर्सनालिटी पर भी काम किया। अब न किसी से मिलने में झिझक होती है और न किसी के हंसने पर कॉन्फिडेंस लो।

पढ़ाई खत्म हुई तो शुरू हुआ जिंदगी का नया चैप्टर
साल 2011 में मेरा डिप्लोमा पूरा हो गया। इसी दौरान दिल्ली एमसीडी में टीचर्स के लिए वैकेंसी आईं, जिसमें मेरा भी सलेक्शन हो गया। यहां मैं बच्चों को पढ़ाती और हर दिन खुद भी कुछ नया सीखती रहती। इसी दौरान मुझे अपने एक साथी से प्यार हो गया। घर में हमेशा से रोका-टोकी हुई थी। मेरी पसंद को तवज्जो नहीं मिली थी, इसलिए जब किसी ने मुझसे प्यार जताया, मुझे पर भरोसा दिखाया तो मैं भी उसके लिए घरवालों से बगावत कर बैठी।

सम्मान के लिए 'सपनों के राजकुमार' से लड़ाई
मार्च, 2015 में शादी कर ली, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू हुई। मैंने घरवालों की पसंद से शादी नहीं की थी, इसलिए अपनों ने मुझसे मुंह मोड़ लिया। सात फेरे लेकर, जिस घर में पहुंची, उसने भी मुझे पूरी तरह कभी नहीं अपनाया। शादी के एक साल बीतने के बाद ही मैं मां बन गई। इसके साथ ही कुछ और भी चीजें ऐसी होने लगी, जिन्होंने मुझे कचोटना शुरू कर दिया, लेकिन प्यार में हम बहुत सी बातों को दरकिनार कर देते हैं, मैंने भी वहीं किया। धीरे-धीरे मेरे हालात बद से बदतर होते गए। मेरे कॉन्फिडेंस को तोड़ने के लिए तरह-तरह के जतन किए गए। मेरा काम बंद करवा दिया गया। मेरी जासूसी के लिए बेडरूम में कैमरे और रिकॉर्डर लगा दिए गए।

सात जन्म का साथ छूटा तो अपनों ने आकर संभाला
बचपन से अपनों से जिस चीज के लिए लड़ती रही। ससुराल में सब कुछ वैसा ही किया जाने लगा। मेरा मोबाइल छीन लिया गया। वाईफाई कनेक्शन कटवा दिया गया। मेरी आजादी खत्म कर दी गई। मुझे कैद सा कर दिया गया। एक रोज मेरे सपनों के राजकुमार ने ही कुछ ऐसा कहा, जो मुझे नागवार गुजरा। अब बात मेरे आत्मसम्मान की थी, खुद्दारी की थी, इसलिए उससे मेरे सब्र का बांध टूट गया। बस फिर क्या था- अपने बेटे का हाथ थाम एक झटके में ससुराल छोड़ दिया। उसने बुलाया नहीं और मैं वापस गई नहीं। करीब तीन महीने बाद कानूनी तौर पर अलग हो गए। इधर, जब मेरे परिवार को इस सबकी खबर मिली तो करीब साढ़े सात साल बाद मेरे पापा ने मुझसे बात की। उस वक्त मेरे घरवालों ने पुरानी सारी नाराजगी परे रख मुझे हिम्मत दी।

जिंदगी की गाड़ी को दोबारा पटरी पर लाई
सब कुछ छोड़ सम्मान की जिंदगी चुनी, ​इसलिए मुश्किलें भी कम नहीं थी। अकांउट में पैसे नहीं थे, मेरे पास रोजी-रोटी कमाने का कोई जरिया नहीं था और मैं भी टूटी और बिखरी हुई थी, लेकिन उस वक्त मैंने हिम्मत दिखाई। सोचा कि गुजारा करने के लिए कुछ तो करना होगा। कुछ समझ नहीं आया तो फिर लिखना शुरू किया। अपने क्राफ्ट के काम को बिजनेस बनाया। एक स्कूल ज्वाइन किया, जहां में स्पेशल बच्चों को पढ़ाने लगी। इस तरह रोजी-रोटी और अपनी पहचान बनाने की जिंदगी की गाड़ी दोबारा पटरी पर लौटने लगी।

हरियाणा के घरों में गूंजती हैं मेरी लिखीं सोहर
इसके बाद मैंने औरतों के दर्द और बेटियों के पैदा होने पर गाई जाने वाली सोहर लिखीं। मुझे सुकून इस बात का है कि मेरे पैदा होने पर सोहर नहीं गाई गई, खुशियां नहीं मनाई गईं, लेकिन आज मेरी लिखी सोहर हरियाणा में बेटियों के पैदा होने पर गाईं जा रही हैं। लेडीज संगीत में मेरे लिखे गीत गाए जाते हैं। मेरी लेखनी के लिए कई संस्थानों में मुझे सम्मानित किया।

स्पेशल बच्चों के लिए जीनी है जिंदगी
मैंने शादी से पहले स्पेशल कैटेगरी के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो मेरे पापा को पसंद नहीं आया। शादी के बाद पति ने साफ कह दिया कि पागल बच्चों के साथ रहने से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, इसलिए उन्होंने मेरा बाहर जाना ही बंद करवा दिया, लेकिन अब मैं अपनी जिंदगी का मालिक हूं। इसलिए मैं स्पेशल कैटेगरी के बच्चों के लिए एक संस्थान शुरू चाहती हूं, जिस पर काम शुरू कर दिया है।

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