करीब चार महीने से श्रीलंका की मुश्किलें/ वहां की सड़कों से संसद तक और लोगों के घरों से राष्ट्रपति भवन तक, सब जगह बिखरी पसरी हैं। कोई रास्ता न देख लोगों ने समंदर का रास्ता धर लिया है और भारत आते जा रहे हैं। श्रीलंका के हालात ऐसे हैं कि कानून की कौन पूछे, लोग जिंदगियां तक फाइबर बोट के हवाले कर रहे हैं।
सारी बातें कई परतों में हैं, जिन्हें समझने के लिए दैनिक भास्कर ने श्रीलंका के अंतिम छोर तलाईमन्नार, जहां से लोग भारत के लिए भाग रहे, वहां पूनम कौशल और भारत के आखिरी छोर रामेश्वरम, जहां श्रीलंकाई पहुंच रहे, वहां मनीषा भल्ला को भेजा। दोनों ने हर सख्ती के बावजूद अहम जानकारियां जुटाईं हैं।
सबसे पहले श्रीलंका के आखिरी छोर तलाईमन्नार से पूनम कौशल की रिपोर्ट...
मैं श्रीलंका के जिस इलाके में जा रही हूं, वो 2009 में लिट्टे की हार से पहले एक कॉन्फ्लिक्ट जोन था। उत्तरी इलाके की तरफ बढ़ते हुए रास्ते में सैन्य चेक पोस्ट पड़ते हैं और जंगल में सेना के कई कैंप भी दिखाई देते हैं। ये कैंप लिट्टे के समय स्थापित किए गए थे। यहां अभी भी कई इलाकों में जाने की मनाही है, क्योंकि अभी भी वहां लिट्टे की बिछाई बारूदी सुरंगें हो सकती हैं।
सेना के चेकपोस्ट पर अपने दस्तावेज दिखाने के बाद हम तट की तरफ बढ़ते हैं। शाम के सवा पांच बजे हैं। मैं एक स्थानीय चर्च में जाकर पादरी से बात करके यहां के हालात समझने की कोशिश करती हूं। फादर ऑन रिकॉर्ड इंटरव्यू देने से ये कहते हुए इनकार कर देते हैं कि उन्हें ऊपर से अनुमति नहीं है।
अनौपचारिक बातचीत में वो ये स्वीकार करते हैं कि इस इलाके से पलायन होता रहा है। फादर बताते हैं, "यहां बहुत से परिवार ऐसे हैं, जो भारत जाना चाहते हैं। अगर समंदर में कोस्टगार्ड का सख्त पहरा ना होता तो वो अब तक चले गए होते।" फादर बताते हैं, "नेवी के अधिकारी कल सुबह की मास प्रेयर (सामूहिक प्रार्थना) के बाद लोगों को पलायन न करने के लिए जागरूक करेंगे।"
मैं फादर से प्रेयर में शामिल होने की अनुमति मांगती हूं। वो तुरंत अधिकारी को फोन करते हैं। उन्हें बताया जाता है कि मीडिया को इस बैठक में आने की अनुमति नहीं होगी। फादर के मुताबिक लोगों को चेतावनी दी जाती है कि अगर उनकी नाव को समंदर में देख लिया गया तो गोली भी मारी जा सकती है।
तलाईमन्नार के समंदर तट पर मछुआरों की नावों की कतार है। यहां सब लोग पलायन के बारे में जानते हैं, लेकिन कैमरे पर कोई बात नहीं करता।
जब मैं मछुआरों से बात कर रही थी, तब कोस्टगार्ड के जवानों ने देख लिया और वो हमारे पास पहुंच गए। उन्होंने इस बात की तस्दीक की कि मैं यहां क्या कर रही हूं। मेरे पासपोर्ट की फोटो ली और उसे अपने अधिकारियों के पास भेज दिया।
जवानों ने मेरे फोन की गैलरी भी चेक की और यहां के कुछ फोटो और वीडियो डिलीट कर दिए। उन्होंने मुझसे कहा कि सख्त आदेश है कि यहां कोई मीडिया से बात न करे। तलाईमन्नार के समंदर तट पर जगह-जगह कोस्टगार्ड की चौकियां हैं और समंदर में कोस्टगार्ड और नेवी की बोट गश्त करती रहती हैं। शाम होते-होते यहां हलचल तेज हो जाती है।
एक चेक पोस्ट पर मौजूद सैनिक बताते हैं, "हमें पूरी रात गश्त करनी होती है। पलायन अधिकतर रात के समय ही होता है। हम समंदर के तट और भीतर समंदर में गश्त करते हैं। रात भर यहां कोई नहीं सो पाता है।"
यहां समंदर में जाने के लिए मछुआरों को कोस्टगार्ड से परमिट लेना होता है और हर बार समंदर में जाते हुए ये परमिट दिखाना होता है। कोस्टगार्ड के पास ये रिकॉर्ड रहता है कि समंदर में कितनी नावें और कितने मछुआरे हैं। एक नाव में अधिकतम दो ही मछुआरों को जाने की इजाजत होती है।
यहां सभी मछुआरे पुरुष हैं और महिलाएं तट पर दिखाई भी नहीं देती हैं। एक मछुआरा कहता है, "महिलाओं को देखते ही कोस्टगार्ड सतर्क हो जाते हैं और नाव को घेर लेते हैं। यहां तट के आसपास अगर कोई महिला दिखती है तो सभी सतर्क हो जाते हैं।"
हमें यहां पता चला कि मुखबिर भी यहां हर समय सक्रिय रहते हैं। मैं तलाईमन्नार में ही तट के पास एक होटल में रुकी। कुछ लोग मेरी गाड़ी की नंबर प्लेट की तस्वीरें खींच रहे थे। जब मैं तट पर मछुआरों से बात कर रही थी, तब भी वहां लोगों ने हमारी तस्वीरें खींचीं। कोस्टगार्ड ने मेरे पासपोर्ट और ड्राइवर के लाइसेंस की तस्वीरें ली और उसे चेताया कि यदि मैंने यहां कुछ गड़बड़ की तो अंजाम ड्राइवर को भुगतना होगा।
यहां लोगों में एक अजीब सा डर और मायूसी भी नजर आई। एक मछुआरे ने हमारे पास आकर बात करनी चाही तो कोस्टगार्ड के जवानों ने उसे फटकार दिया। लोग अपने हालात तो बयान करना चाह रहे थे, लेकिन कर नहीं पा रहे थे। उनकी आंखें बोल रहीं थीं, लेकिन जुबान बेबस थी।
अवैध पलायन पर बात करते हुए एक मछुआरा बताता है कि श्रीलंका से भारत के रास्ते बाहर जाने वाले लोग यहां आते रहे हैं। वो बताता है, "पहले 25 हजार (श्रीलंकाई रुपए) में यहां से भारत पहुंचा दिया जाता था। फिर रेट बढ़कर पचास हजार रुपए और अब के हालात में तो एक लाख रुपए तक लग रहे हैं। अगर कोई पूरा परिवार एक साथ जाना चाहता है तो ज्यादा पैसे लगते हैं।"
एक अन्य मछुआरा कहता है कि, "यदि कोई वैध तरीके से भारत जाना चाहे तो पासपोर्ट बनवाना पड़ता है, वीजा के लिए लाइन में लगना पड़ता है और 60 हजार रुपए का हवाई टिकट आता है। ऐसे में लोगों को यहां से अवैध तरीके से जाना सस्ता और आसान लगता है।"
नाव के जरिए श्रीलंका से भारत के तट तक की यात्रा के बारे में बताते हुए एक अन्य मछुआरे ने कहा, "अगर चालीस किलोमीटर की रफ्तार से भी बोट चले तो हम आधे घंटे में भारत के क्षेत्र में होते हैं। जाने वाले रिस्क लेते ही हैं। अब इतने सख्त पहरे के बावजूद भी रिस्क ले ही रहे होंगे।"
ये तो हो गई श्रीलंका के उस छोर की बात जहां से पलायन हो रहा है। अब चलते हैं भारत के धनुषकोडी और रामेश्वरम की तरफ, जहां लोग पलायन करके पहुंच रहे हैं। यहां भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला मौजूद हैं।
श्रीलंका से पलायन करके भारत में शरण लेने वालों में शिवा और उनका परिवार भी है। वो इस वक्त रामेश्वरम के मंडपम शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं। शिवा बताते हैं कि फाइबर की कश्ती में बैठकर लोग श्रीलंका से भारत का सफर कर रहे हैं।
शिवा बताते हैं कि उन्होंने सुबह 8 बजे अपनी यात्रा शुरू की, लेकिन समंदर के बीच पहुंचते ही उनकी कश्ती का इंजन खराब हो गया। बदहवास हालत में थक हारकर हम चार से पांच घंटे कश्ती में ही बैठे रहे। हमारी किस्मत अच्छी थी। इंडियन नेवी की पेट्रोलिंग कर रही बोट में बैठे सैनिकों की हम पर नजर पड़ी। वो हम तक पहुंचे और डिटेन करके भारत ले आए।
एक तरह से शिवा परिवार समेत गिरफ्तार किए गए थे, लेकिन फिर राज्य सरकार ने फैसला किया कि किसी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, बल्कि केंद्र सरकार का फैसला आने तक सभी को शरणार्थी कैंप भेजा जाएगा। इस तरह से शिवा के परिवार को मंडपम शरणार्थी कैंप भेज दिया गया।
कैंप में रह रहे गजेंद्र और जांगसी श्रीलंका की हालत याद करके सिहर उठते हैं। उन्होंने बताया कि श्रीलंका में खाने के लिए मशक्कत करते 4 महीने हो गए। बच्चों के लिए दूध तक मिलना दूभर था। इस वक्त श्रीलंका में चावल, सिलेंडर और दूध इतना मंहगा हो चुका है आम आदमी नहीं खरीद सकता है। जांगसी ने बताया कि श्रीलंका में उसके पति की कमाई 5,500 रुपए है, लेकिन वहां अभी एक परिवार के खाने का रोज का खर्च 3 हजार रुपए है।
श्रीलंका से भारत आने वाले ज्यादातर लोग श्रीलंकन तमिल हैं। करीब 100 साल पहले इनके पूर्वज श्रीलंका में कॉफी बागानों में काम करने गए और वहीं रह गए। रामेश्वरम पुलिस के अनुसार अभी तक चार बैच में कुल 40 लोग आ चुके हैं और लगातार लोगों का आना जारी है।
फिलहाल श्रीलंका से आने वाले लोगों को शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया गया है। सरकार ने विदेश मंत्रालय के पास फाइल भेजी है कि इन्हें किस कैटेगरी में रखा जाए।
कैंप में कुल 240 लोग रहे हैं, जिसमें से 40 लोग पिछले कुछ दिनों में आए हैं। इनका कहना है कि श्रीलंका से हजारों लोग भारत आने की फिराक में हैं। वह इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें यहां शरणार्थी दर्जा दे दिया जाए। शरणार्थी दर्जा मिलने के बाद उन्हें कई मूलभूत सुविधाएं मिल जाती हैं।
हमें रामेश्वरम के बाजार में गैर कानूनी तरीके से काम कर रहे श्रीलंकन मिले। बतौर शरणार्थी वे लोग यहां नौकरी नहीं कर सकते हैं। उन्हें कैंप में ही रहना होता है। राज्य सरकार उनमें से घर के मुखिया को 1500 रुपए, पत्नी को 1000 रुपए, 12 साल से ऊपर के बच्चे को 750 रुपए और 12 साल से नीचे की उम्र के बच्चे को 500 रुपए दे रही है।
इसके अलावा चावल और केरोसिन भी मुफ्त मिलता है। शरणार्थी कैंप में ही उनके बच्चों के लिए स्कूल है और एक अस्पताल भी है। हालांकि अस्पताल में दवा का खर्च इन्हें खुद ही उठाना होता है।

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