रायपुर। राजधानी रायपुर में बहुप्रतीक्षित स्काईवॉक परियोजना एक बार फिर चर्चा में है, जहां आम जनता को अब लगभग 100 सीढ़ियां चढ़कर और उतारकर इसका उपयोग करना पड़ सकता है। करीब 10 महीने बीत जाने के बाद भी इस परियोजना का काम अधूरा पड़ा हुआ है, जिससे शहरवासियों में असंतोष और सवाल दोनों बढ़ते जा रहे हैं। यह वही स्काईवॉक है जिसे पैदल यात्रियों की सुविधा और ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू बनाने के उद्देश्य से तैयार किया जा रहा था, लेकिन अब यह परियोजना राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बन गई है।
जानकारी के अनुसार स्काईवॉक का निर्माण कार्य लंबे समय से धीमी गति से चल रहा है और कई महत्वपूर्ण हिस्सों का काम अभी भी अधूरा है। खासकर सीढ़ियों और कनेक्टिंग स्ट्रक्चर को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, जिसके चलते अनुमान लगाया जा रहा है कि उपयोगकर्ताओं को एक ओर से दूसरी ओर जाने के लिए लगभग 100 सीढ़ियों का सहारा लेना पड़ेगा। इससे बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए यह परियोजना उपयोगी होने के बजाय चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।
वहीं दूसरी ओर इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कांग्रेस ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यह परियोजना पूर्व मंत्री राजेश मूणत की जिद का परिणाम है और वर्तमान सरकार उसी अधूरे और अव्यवहारिक डिजाइन को पूरा करने में जुटी हुई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जनता की जरूरतों और व्यावहारिकता को नजरअंदाज कर यह प्रोजेक्ट शुरू किया गया था, जिसका खामियाजा अब शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है।
दूसरी ओर सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि परियोजना को बेहतर तकनीकी सुधारों के साथ पूरा किया जा रहा है और जैसे ही निर्माण कार्य पूरा होगा, यह स्काईवॉक शहर के ट्रैफिक दबाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अधिकारियों का कहना है कि निर्माण कार्य में कुछ तकनीकी और डिजाइन संबंधी बदलावों के कारण देरी हुई है, लेकिन जल्द ही इसे जनता के लिए खोल दिया जाएगा।
स्थानीय नागरिकों में इस देरी को लेकर नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का कहना है कि जिस परियोजना का उद्देश्य सुविधा देना था, वह अब परेशानी का कारण बनती जा रही है। रोजाना आवागमन करने वाले लोगों को यह डर सता रहा है कि कहीं यह स्काईवॉक उपयोग के बजाय केवल दिखावे की परियोजना बनकर न रह जाए।
कुल मिलाकर रायपुर का यह स्काईवॉक अब विकास और राजनीति दोनों का प्रतीक बन गया है, जहां एक ओर निर्माण की अधूरी तस्वीर सवाल खड़े कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाजी इसे और अधिक गरमा रही है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में यह परियोजना जनता के लिए कितनी उपयोगी साबित होती है या फिर यह केवल विवादों तक ही सीमित रह जाती है।

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