प्रदेश के सबसे बड़े अंबेडकर अस्पताल की स्टाफ नर्सों को 14 साल के लंबे अंतराल के बाद प्रमोशन तो मिला। लेकिन, उनकी पदोन्नति से अस्पताल खाली हो गया। अस्पताल की 205 नर्सें प्रमोट होकर नर्सिंग सिस्टर बनीं, इनमें से 146 का ट्रांसफर अलग-अलग मेडिकल कॉलेज अस्पताल हो गया है। एक साथ इतनी नर्सों के चले जाने से अस्पताल में मरीजों के इलाज का सिस्टम गड़बड़ाने का खतरा पैदा हो गया है। मापदंडों के अनुसार 5 बिस्तर पर एक नर्स की पोस्टिंग होनी चाहिए, अब 1400 सौ बिस्तरों पर केवल 178 नर्स रह जाएंगी।
तीन शिफ्ट के हिसाब से एक नर्स पर 24 बेड की जिम्मेदारी रहेगी। मेडिकल कॉलेज प्रशासन और अंबेडकर अस्पताल प्रबंधन के लिए भी शेष रह गईं 178 स्टाफ नर्सों से पूरे सिस्टम को चलाना चुनौती बन गया है। स्टाफ नर्सों की जरूरत सामान्य वार्डों से लेकर आईसीसीयू, एमआईसीयू के अलावा बच्चों की नर्सरी में भी रहती है।
लेबर रूम से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक में नर्सों की अहम भूमिका रहती है। वार्डों में ओपीडी के बाद पूरे मरीज एक तरह से नर्सों के भरोसे ही रहते हैं। मरीजों को दवा देने से लेकर उनकी एक-एक एक्टिविटी पर नजर रखने की जिम्मेदारी नर्सों की ही रहती है। स्वास्थ्य विभाग के अफसर खुद मानते हैं कि सीधे तौर पर नर्स ही मरीज की देखरेख करती हैं।
स्टाफ नर्सों के प्रमोशन के बाद 1400 बेड वाले अंबेडकर अस्पताल में अब 178 नर्सें ही रह गईं हैं। ऐसे में नर्सों को पूरा-पूरा वार्ड संभालना पड़ जाएगा। अंबेडकर अस्पताल में स्टाफ नर्स के स्वीकृत पद 566 हैं। इन पदों की तुलना में यहां 324 की पोस्टिंग थी। यानी पहले ही पूरे पद भरे नहीं गए थे।
अब उसमें से 146 को प्रमोशन के बाद अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में पदस्थ कर दिया गया है। भर्ती की प्रक्रिया चल रही चिकित्सा शिक्षा संचालक डाॅ. विष्णु दत्त का कहना है कि अस्पताल में सभी पदों पर भर्ती की कवायद चल रही है। नए सेटअप का पूरा प्रस्ताव भेज दिया गया है। शासन से स्वीकृति मिलते ही भर्ती कर दी जाएगी।

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