हाईकोर्ट   : वार्ड ब्वॉय की भर्ती के लिए कौशल परीक्षा नहीं
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बिलासपुर  7 मई  2022

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायगढ़ के स्व. लखीराम अग्रवाल मेडिकल कॉलेज में वार्ड ब्वॉय की भर्ती के लिए कौशल परीक्षा लेने के आदेश को निरस्त कर दिया है। जस्टिस पी सैम कोशी ने कहा है कि भर्ती के लिए रिजल्ट जारी होने के बाद प्रक्रिया में बदलाव करना गलत है। इसके साथ ही कोर्ट ने मेडिकल कॉलेज को लिखित परीक्षा के आधार पर ही चयन प्रक्रिया पूरी करने के लिए कहा है।

रायगढ़ के स्व. लखीराम अग्रवाल मेडिकल कॉलेज में वार्ड ब्वॉय के 42 पदों पर भर्ती के लिए 19 सितंबर 2017 को विज्ञापन जारी किया गया था। भर्ती लिखित परीक्षा और मेरिट सूची के आधार पर करने की जानकारी दी गई थी। इसके लिए मनराज तंबोली के साथ ही अन्य आवेदकों ने फार्म जमा किया था। लिखित परीक्षा के बाद 22 जनवरी 2018 को परिणाम घोषित किया गया, जिसमें मनराज तंबोली अन्य पिछड़ा वर्ग में तीसरा स्थान हासिल किया। लेकिन, परिणाम आने के दो दिन बाद ही चयन समिति ने 27 जनवरी को निर्णय लिया कि अब वार्ड ब्वॉय का पद टेक्निकल है। इसलिए भर्ती के लिए कौशल परीक्षा भी ली जाएगी। इस आधार पर समिति ने एक अनुपात सात में कौशल परीक्षा के लिए आवेदकों को बुलाया। इस पर मनराल तंबोली ने आपत्ति जताई। लेकिन, समिति ने आपत्ति को दरकिनार कर दिया।

हाईकोर्ट में दी चुनौती, कहा- परिणाम जारी होने के बाद कौशल परीक्षा लेना गलत है
मनराज तंबोली ने अपने अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव के माध्यम से याचिका दायर की। इसमें बताया कि भर्ती के लिए एक बार परिणाम घोषित होने के बाद दोबारा कौशल परीक्षा नहीं ली जा सकती। यह गलत है। याचिकाकर्ता ने चयन समिति के समक्ष आपत्ति भी जताई थी, जिसका कोई जवाब नहीं दिया गया। मामले में मेडिकल कॉलेज की तरफ से जवाब में कहा गया कि भर्ती के लिए परीक्षा चयन समिति का विशेष अधिकार है। याचिकाकर्ता खुद कौशल परीक्षा में भाग लिया है, इसलिए वह इसे चुनौती नहीं दे सकता।

हाईकोर्ट ने कहा- कौशल परीक्षा लेना गलत है
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता ने भले ही भर्ती के लिए कौशल परीक्षा दिया है। लेकिन, उसने पहले ही आपत्ति जताई थी। इस दौरान जस्टिस पीसैम कोशी ने सहमति जताते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया शुरू होने और परिणाम घोषित होने के बाद विज्ञापन की शर्तों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। भर्ती नियम में चयन समिति को इस प्रकार का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। न ही न्यायालय के समक्ष ऐसे कोई अधिकार का प्रावधान शासन की ओर से बताया गया है।

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