आदिवासी हितों की रक्षा के नाम पर आदिवासियों को ही निशाना बना रहे नक्सली, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी कर रहे वंचित…
त्वरित ख़बरें - दीपमाला शेट्टी रिपोर्टिंग

रायपुर। बुधराम कोरसा, हरीश कोर्राम, सोमडू वेट्टी, सुदर्शन वेट्टी, डूम्मा मरकाम, पण्डरू राम पोयाय, बामन सोढ़ी ये वे जवान हैं, जिन्हें नक्सलियों ने सोमवार को बीजापुर जिले में कुटुरू में आईईडी ब्लास्ट के जरिए एक ही पल में शहीद बना दिया. डीआरजी के इन तमाम जवानों में एक चीज कॉमन थी कि ये आदिवासी थे. कुल मिलाकर आदिवासी हितों की रक्षा करने की बात करने वाले नक्सली अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए आदिवासियों को ही निशाना बना रहे हैं.

सोमवार को मारे गए डीआरजी के जवानों में से सभी 30-35 साल के बीच के थे. कोई दंतेवाड़ा जिले का तो कोई बीजापुर जिले का रहने वाला था. सभी का अपना भरा-पूरा परिवार था, किसी के छोटे-छोटे बच्चे हैं, तो किसी के बूढ़े मां-बाप. परिवार का सहारा बनने ध्येय से बल में शामिल हुए इन आदिवासी जवानों की शहादत के बाद पैदा हुई शून्यता से परिजन कैसे निपटेंगे, ये तो वही बता सकते हैं. कोई भी सरकारी आर्थिक मदद इन जवानों की याद को परिजनों के मनो-मस्तिष्क से हटा नहीं सकती है.

ऐसा नहीं है कि नक्सलियों ने केवल सोमवार को किए आईईडी ब्लास्ट में आदिवासियों को अकाल मौत दी हो. अगर नक्सलियों का पूरा इतिहास खंगाले तो पाएंगे कि आदिवासी हितों की रक्षा करने के लिए आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन को सुरक्षित रखने के नाम पर आदिवासियों को ही निशाना बनाया है. न केवल जवान आदिवासियों को समय से पहले काल-कलवित किया हो, या फिर जो सुविधाएं – सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल-कूद में अवसर जैसे दूसरे क्षेत्र के लोगों के लिए सामान्य है, उससे पूरे आदिवासी वर्ग को वंचित किया है.

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कार्यभार संभालने के बाद सबसे पहला काम नक्सलियों को वार्ता के लिए आमंत्रित करने का किया था, बिना शर्त. लेकिन नक्सली हमेशा की तरह मुंह छिपाते रहे. यही नहीं इस दौरान नक्सलियों ने ऐसा कोई काम किया, जिससे आभास हो कि नक्सलियों को वाकई में सुविधाओं से वंचित दूर-दराज के क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों की हितों की रक्षा के लिए कोई काम किया हो. नक्सली न तो आदिवासियों को शिक्षा दे सकते हैं, न ही स्वास्थ्य. बिजली-पानी-सड़क जैसी सुविधा देने की बात तो बहुत दूर की है.

सवाल यह है कि नक्सली कब तक अपने काले कामों को अंजाम देने के लिए आदिवासियों के नाम का उपयोग करते रहेंगे. कब तक मानवाधिकार की दुहाई देने वाले आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय समाजसेवी, स्वयं सेवी संगठन अथवा आदिवासी संगठन सरकार पर निशाना साधने की बजाए मासूम आदिवासियों की नृशंस हत्या पर नक्सलियों के खिलाफ अपनी बात कहेंगे. जबाव है शायद कभी नहीं, क्योंकि यह केवल बस्तर, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र की ही बात नहीं है. यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय षड़यंत्र है, भारत के खिलाफ, जिसमें बड़े-बड़े नक्सली नेता खुद प्यादा बने हुए हैं.

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