हाईकोर्ट ने कहा- जहां छात्र नहीं, वहां शिक्षकों की तैनाती का औचित्य नहीं

त्वरित खबरें :अरुण रिपोर्टिंग

दुर्ग/संवाददाता। हाईकोर्ट ने अतिशेष व्याख्याताओं को राहत देने से इनकार करते हुए साफ कहा है कि जहां छात्र ही नहीं हैं, वहां शिक्षकों की तैनाती का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शैक्षणिक संसाधनों का उपयोग जरूरत और छात्र संख्या के आधार पर ही होना चाहिए।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सिंगल बेंच के फैसले पर मुहर लगाते हुए याचिकाकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि जिन शालाओं में विद्यार्थियों की संख्या नहीं के बराबर है, वहां अतिरिक्त शिक्षकों को बनाए रखना व्यवस्था के हित में नहीं कहा जा सकता।

इस फैसले को शिक्षा विभाग की उस नीति के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत अतिशेष शिक्षकों को जरूरत वाले स्कूलों में पदस्थ किया जा सकता है। अदालत की टिप्पणी से यह संकेत भी मिला है कि शिक्षण व्यवस्था में संतुलन, उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग और छात्रहित सर्वोपरि हैं।

फैसले के बाद संबंधित पक्षों में चर्चा तेज हो गई है। शिक्षा विभाग के भीतर भी इस निर्णय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में अतिशेष शिक्षकों की पदस्थापना और समायोजन से जुड़े मामलों में स्पष्ट दिशा मिल सकती है।

न्यायालय की यह टिप्पणी शिक्षा व्यवस्था में व्यावहारिकता और जरूरत के आधार पर निर्णय लेने की अहमियत को रेखांकित करती है।