साहेब की थाली स्वादिष्ट भोजन से भरी हुई थी लेकिन फिर भी उन्हें स्वाद नहीं आया, मुनिया को सिर्फ़ दाल-चावल मिले लेकिन स्वाद भरे
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  • साहेब की थाली भोजन से भरी हुई थी। ज़बान बदमज़ा हुई पड़ी थी और मुंह में निवाला रखते ही शिक़ायतों का रेला निकल रहा था।  
  • मुनिया को तो केवल दाल-चावल मिले, लेकिन बेहद स्वाद-भरे। ऐसा क्योंकर हुआ होगा?

सब्ज़ी को रोटी के एक टुकड़े में लपेट कर बड़े साहेब ने मुंह में डालकर चबाना शुरू किया। जिस स्वाद की उन्हें आशा थी वो ज़ुबान पर अनुभव न हुआ तो वो खीज कर बोले, ‘आजकल किसी भी चीज़ में कुछ स्वाद ही नहीं रहा।’ फिर एक चम्मच कटोरी के अंदर डुबाया और चम्मच भर पीली दाल सुड़क कर मुंह के अंदर डाल ली। उनकी ज़ुबान ने फिर से सुस्वाद परीक्षा में भोजन को पास न किया। अबकी बार बड़े साहेब की खीज पत्नी पर निकली। भोजन में स्वाद नहीं है, मतलब पत्नी ने ही भोजन बनाने में कुछ आलस्य बरता होगा। ‘मीरा...।’ इनका स्वर थोड़ा तेज़ और रूठा हुआ-सा था।


गरम दाल को चम्मच से सुड़कते हुए साहेब ने पत्नी को आवाज़ दी जो रसोई से भागते हुए सलाद ला रही थीं। जैसे ही वो निकट पहुंची। साहेब ने पूछा- ‘आज अरहर दाल बिन खटाई की बना दी है क्या?’ ‘क्या हुआ जी? सब कुछ डाला है कली खटाई, टमाटर, धनिया, मिर्चा सब। अब फसल में ही स्वाद न हो तो कोई क्या करे?’ मीरा ने साहेब की थाली में बड़ी मुश्किल से जगह बनाते हुए सलाद परोसा। दो तरह की सब्ज़ी, दाल, रोटी, चावल, अचार, चटनी, पापड़ सब पहले से ही थाली में जगह घेरे बैठे थे। फिर सलाद के टुकड़ों को यूं जगह लेनी पड़ी जैसे ट्रेन के ठसाठस भरे हुए जनरल डिब्बे में किसी स्टेशन पर और यात्रियों का चढ़ आना। साहेब ने मूली का एक सख़्त टुकड़ा उठा कर मुंह में डाल लिया। फिर थोड़ा नरम होते हुए बोले, ‘वही तो। बचपन वाला वो स्वाद रहा ही नहीं। मुझे अच्छी तरह से याद है, स्कूल जाने से पहले हम लोगों को अम्मा सिर्फ़ दाल चावल कटोरे में डाल के दे देती थीं। क्या स्वाद था, वाह। अब नकली खाद, फर्टिलाइज़र, इंजेक्शन देकर फसल उगाएंगे तो कहां से सब्ज़ी, दाल, चावल, रोटी में स्वाद आएगा। बस पेट भरने को खा लो। तृप्ति तो मिलने से रही।’ साहेब ने अबकी बार रोटी सब्ज़ी में ढेर-सी हरी धनिया की चटनी लगा कर कौर को मुंह के अंदर धकेला। शायद अबकी बार स्वाद मिल जाए।

स्वाद फिर भी नहीं मिला। ‘धनिया में भी अब महक नहीं रही।’ उन्होंने मुंह बिचकाया। अचानक मीरा का ध्यान गया कि मुनिया का बच्चा थोड़ी दूर पर ही खड़ा है और इधर ही ताके जा रहा है। ‘अरे मुनिया, कितनी बार कहा है, अपने बच्चे को अपने पास बैठाया करो। जब साहेब खाना खाया करें तो इनसे दूर रखा करो।’ मीरा ने मुनिया को कड़क स्वर में िझड़का। फिर मन में बड़बड़ाईं- ‘चटोरा कहीं का, इनके खाने को नज़र लगा देता है। तभी तो इनको खाने में स्वाद नहीं आता।’ मीरा के चेहरे पर गंदे-संदे, मैले-कुचैले, नाक बहाते बचवा के लिए घृणा का भाव स्पष्ट देखा जा सकता था। मुनिया ने जैसे ही मेमसाहेब की आवाज़ सुनी, हाथ में जो झाड़ू थाम रखी थी, उसे छोड़कर वह त्वरित गति से दौड़ते हुए आई, जैसे पल भर की भी देर हो गई तो अनिष्ट हो जाएगा, भूकम्प आ जाएगा। फौरन मुनिया ने बचवा को कस कर डपटा, ‘क्यों खड़ा है यहां?’ फिर साहेब, मेमसाहब को दिखाने के लिए एक हल्का-सा चांटा भी बचवा को रसीद किया और उसे ज़बरदस्ती खींच कर गोद में उठा कर ले गई। बचवा मुनिया की गोद में टंगा था। मुनिया आगे बढ़ती जाती थी, बचवा पीछे देखता जाता था। उसकी दृष्टि साहेब की थाली पर ही चिपकी हुई थी। उससे विलग हो ही नहीं पा रही थी। मुनिया कोने में ले जाकर अपने बाबू को पुचकारने लगी- ‘भूख लगी है न बचवा। बस अभी झाड़ू-पोंछा लगा लूं फिर घर चल कर तुझे अच्छा-सा खाना देती हूं। ठीक है मेरा राजा?’ बचवा की लार अभी तक बह रही थी और आंखों में एक अजीब-से लालच में डूबी हुई भूख थी। साहेब की थाली अब सामने नहीं थी, मगर मन से उसकी तस्वीर अभी तक धुंधली नहीं पड़ी थी। मुनिया का मन भर आया। वह अपने दो साल के बच्चे के मन की बात अच्छी तरह समझ रही थी, जो अभी ठीक से बोल भी नहीं पाता था। तभी साहेब के डकार लेने की आवाज़ें आने लगीं। उनका भोजन समाप्त हो चुका था। मीरा मेमसाब डाइनिंग टेबल से खाने-पीने का सामान हटा कर रसोई में रखने लगीं। मुनिया झाड़ू-पोंछा निपटाने के बाद बेसिन में बर्तन धोने के लिए आ गई। उसने देखा कि बचा हुआ भोजन मेमसाब छोटे बर्तनों में निकालकर फ्रिज में रखने की तैयारी कर रही हैं। मुनिया के अंदर की ममता ने उसे हाथ पसारने पर मजबूर कर दिया। उसके अंदर की मां ने बड़े संकोच के साथ कहा- ‘मालकिन, अगर दाल-चावल बचा हो, तो थोड़ा-सा दे दीजिए। बचवा भूखा है शायद। आज सुबह जल्दी में उसे कुछ खिला नहीं पाई थी।’ मीरा ने अपने स्वर में बनावटी मिश्री घोलते हुए कहा, ‘अरे हाँं..हां.. क्यों नहीं। एक आदमी भर का खाना मैं हमेशा ज़्यादा बनाती हूं। इसके भर का हो ही जाएगा।’ ‘लड़के ने वैसे ही उनके खाने पर नज़र लगा दी है। अगर इसे नहीं दूंगी तो उनका खाना कहां पचेगा भला?’ मन में वितृष्णा से बुदबुदाते हुए मीरा महरी के लिए अलग से रखे हुए बर्तनों में दाल-चावल परोसने लगीं। मुनिया ने फौरन अपने हाथ धोए, जल्दी से आंचल से हाथ पोंछे, लपक कर थाली ले ली। फिर उसने दाल-चावल साना, कौर बना कर बचवा को खिलाने लगी। बचवा लपक-लपक के खाने लगा, जैसे उसे अमृत मिल गया हो। दो कौरों के बीच का इंतज़ार भी उसे सहन नहीं हो रहा था। भूख तो मुनिया को भी बड़ी ज़ोर की लगी थी, पर बचवा का पेट भरना ज़रूरी था पहले। चार-पांच कौर बचवा को खिलाने के बाद मुनिया से रुका नहीं गया। उसने बीच में एक कौर अपने मुंह में भी डाल ही लिया। कौर मुंह में रखते ही उसे ये समझ में नहीं आया कि साहेब क्यों कह रहे थे खाने में स्वाद नहीं है? सादे दाल-चावल में भी कितना तो स्वाद है। घी, नमक, छौंका सबका अनुपात बराबर तो है।

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