श्री राम कथा की सर्वप्रथम रचना शंकर जी ने की और देवता, दानव ,मानव में बांट दिए ...

त्वरित खबरें -तान्या देशमुख रिपोर्टिंग

राजनांदगांव - पद और मद दोनों सगा भाई हैं,,पद में बने रहने से से व्यक्ति को मद हो जाता हैं और जैसे ही वह पद से उतरता है भूत बन जाता है। उक्ताशय का उद्गार कथावाचक आचार्य नरेंद्र नयन शास्त्री जी लेवर कालोनी में आयोजित अपने चौथे दिन के श्रीमद्भागवत कथा के दौरान व्यक्त की। महराज जी ने आगे कहा कि पद से उतरने पर वह भूतपूर्व फलानां भूतपूर्व ढेकानां कहलाने लग जाता है। यानिकि जीते- जी वह भूत हो जाता हैं। सीताराम -सीताराम के भजन में झूमे  श्रद्धालु नेता प्रति पक्ष श्री पिल्ले परिवार की श्रीमद भागवत की आनंदमयी आरती- पूजा के पश्चात कलाकारों द्वारा सीताराम - सीताराम कहिए,,जेही विधि राखे राम तेरी विधि रहिए के सुमधुर गान किया गया जिससे भक्त जन झूम उठे। इसके बाद शुरू हुई श्रीमद भागवत कथा में कथावाचक आचार्य शास्त्री जी ने बताया कि इस पृथ्वी पर सबसे पहले राम कथा 100 करोड़ दोहा - चौपाई के माध्यम से भगवान श्री शंकर ने कही थी। जिसे उन्होंने मां पार्वती को अमर कथा के रुप में सुनाया था। एक करोड़ दोहा-चौपाई को भगवान शंकर ने बांट दिए श्री राम कथा के इस एक करोड़ दोहा-चौपाई को देवता- दानव और मानव द्वारा मांग होने पर भगवान शंकर ने पहले 33 लाख ,33 लाख तीनों को दिया गया। इससे भी उनका मन नहीं भरा और भगवान शंकर से फिर से मांग होने लगी  तब शेष बचे एक लाख में से फिर 33 हजार 33 हजार फिर उनमें बांट दिया। देवता, दानव और मानव को राम कथा इतना प्रिय और‌ कल्याणकारी लगा कि फिर से इसमें से भगवान भोले भंडारी से एक-एक हजार दोहे-चौपाई भी मांग लिए। सबसे बड़े दाता भगवान शंकर फिर से 33 सौ 33 सौ दोहे- चौपाई फिर दें दिए। हद तब हो गई जब देवता दानव और मानव‌ ने इसमें से भी भगवान शंकर से याचना कर बचें हुए मंत्र स्वरुप दोहे चौपाईयों की 33- 33 दोहे चौपाईयो की फिर मांग हुई। महराज जी ने बताया कि संस्कृत के अनुष्टुप छंद में 32 अक्षर होते हैं इसमें से 10 -10 अक्षर बांट दिए जाने से बचा सिर्फ दो अक्षर। वह राम शब्द है। भगवान शंकर ने बचें हुए दोहे - चौपाइयों को तीनों में बांट कर सिर्फ एक भगवन्नाम वाले "राम" शब्द को अपने पास रख लिया। जब इसकी भी मांग होने लगी तब भगवान शंकर अपने आराध्य भगवान श्री राम को उन्हें देने से मना कर दिया। इसी राम शब्द से महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण की रचना की और गोस्वामी तुलसीदास जी ने कलियुग में लोक भाषा में श्रीराम चरित मानस की रचना की जो मनुष्य मात्र को संसार सागर पार करने का माध्यम बना हुआ है। मात्र चाय पीकर अपना जीवन निर्वाह करने वाले आचार्य नरेंद्र नयन शास्त्री जी के  गुढ़ार्थ श्रीमद भागवत कथा को सुनने लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है।