पाकिस्तान में 9 इस्लामिक जगहों के नाम नहीं बदलेंगे:हिंदू-सिख दौर का नाम रखा जाना था, कट्टरपंथियों के विरोध के बाद फैसला बदला
त्वरित खबरे ;हर्ष कुमार गुप्ता

पाकिस्तान सरकार ने देश के कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के नाम बदलने के प्रस्ताव को फिलहाल वापस ले लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान में मौजूद 9 इस्लामिक पहचान वाले स्थानों के नाम हिंदू और सिख दौर से जुड़े पुराने नामों पर रखने की तैयारी की जा रही थी, लेकिन कट्टरपंथी संगठनों और धार्मिक समूहों के तीव्र विरोध के बाद सरकार ने अपना फैसला बदल दिया। इस मुद्दे ने पाकिस्तान में राजनीतिक और धार्मिक बहस को और तेज कर दिया है। बताया जा रहा है कि यह प्रस्ताव ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने और विभाजन से पहले के सांस्कृतिक इतिहास को सामने लाने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। कुछ इतिहासकारों और सांस्कृतिक संगठनों का मानना था कि पुराने नामों को बहाल करने से क्षेत्र की वास्तविक ऐतिहासिक पहचान सामने आएगी और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि, जैसे ही इस प्रस्ताव की जानकारी सार्वजनिक हुई, कई कट्टरपंथी संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका कहना था कि इस्लामिक पहचान वाले शहरों और स्थानों के नाम बदलना धार्मिक भावनाओं के खिलाफ है और इससे देश की इस्लामिक पहचान कमजोर होगी। विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया अभियान के बाद सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। कई धार्मिक नेताओं ने इसे “इस्लामी इतिहास को मिटाने की कोशिश” बताया। बढ़ते विवाद को देखते हुए पाकिस्तान प्रशासन ने फिलहाल नाम परिवर्तन की प्रक्रिया रोकने का निर्णय लिया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक बदलाव से पहले सभी पक्षों की सहमति जरूरी है और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता दी जाएगी।

इस पूरे विवाद ने पाकिस्तान में सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक पहचान के बीच टकराव को फिर उजागर कर दिया है। एक वर्ग का मानना है कि भारत विभाजन से पहले के इतिहास को स्वीकार करना और पुराने नामों को संरक्षित करना किसी भी देश की ऐतिहासिक जिम्मेदारी होती है। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि इससे धार्मिक संवेदनाएं प्रभावित हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान में इस तरह के मुद्दे अक्सर राजनीतिक और धार्मिक बहस का केंद्र बन जाते हैं। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जिन 9 स्थानों के नाम बदलने पर विचार हो रहा था, उनमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और मौजूदा नाम ही बरकरार रहेंगे। इस फैसले के बाद कट्टरपंथी संगठनों ने राहत जताई है, जबकि इतिहास और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े कुछ संगठनों ने इसे निराशाजनक बताया है।

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