किसानों ने साबित किया जैविक खाद बेहतर:दुर्ग के खेतों में आमने-सामने धान लगाकर रसायनिक और कम्पोस्ट दोनों खाद डाली, फसल से निकला रिजल्ट
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अब तक जो किसान अधिक पैदावार लेने के लिए रासायनिक खाद का उपयोग करते थे, वो अब जैविक खाद की ओर जा रहे हैं। दुर्ग जिले के 70 प्रतिशत से अधिक किसानों ने जैविक खाद का उपयोग अपने खेतों में करना शुरू किया है। गनियारी और बोरई के प्रगतिशील किसानों ने तो इसको लेकर एक अनूठा प्रयोग भी किया। उन्होंने एक एकड़ खेत की फसल में रासायनिक और दूसरी तरफ एक एकड़ फसल में जैविक खाद का उपयोग किया। इसके बाद किसानों ने पाया कि जैविक खाद की फसल अधिक अच्छी और उसकी बालियां भी मोटी निकली। वहीं रासायनिक खाद की फसल के पौधे अधिक लंबे और पतली बाली वाले पाए गए। पौधों की लंबाई अधिक होने से फसल भी झुक गई। जब दोनों खेत की पैदावार ली गई तो पाया गया कि जैविक खाद से प्रति एकड़ एक क्विंटल अधिक पैदावार मिली। इसके बाद से वहां के शत प्रतिशत किसानों ने जौविक खाद अपनाने का फैसला लिया है।

बोरई के कृषक झवेन्द्र वैष्णव ने बताया कि उन्होंने इस साल 17 एकड़ जमीन में से एक एकड़ जमीन में जैविक खेती करने का फैसला लिया। इसके लिए वह कृषि विभाग के अधिकारियों से मिला। अधिकारियों ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से उसे "छत्तीसगढ़ी देवभोग सुगंधित धान" का बीच मुहैया कराया। इसके बाद लगभग 200 किलोग्राम वर्मी कंपोस्ट खाद के साथ उस बीच को बोया गया। वर्मी कपोस्ट खाद की बदौलत उसकी फसल बहुत अच्छी रही। पूरा खेत धान की बालियों से खचा-खच भरा हुआ था। उसने पाया कि बीते वर्ष रासायनिक खाद का उपयोग करके उसने प्रति एकड़ 15 क्विटल धान की उपज ली थी। जबकि जैविक खाद का उपयोग करने से उसे प्रति एकड़ 16 क्विटल धान का उत्पादन मिला। इस परिणाम से संतुष्ट होकर झवेंद्र ने पूरे 17 एकड़ खेत में जैविक खेती करने का निर्णय लिया है।

चावल की सुगंध भी है अधिक

झवेंद्र वैष्णव ने बताया कि उसने जैविक खाद से पैदा देवभोग सुगंधित चावल को बनाया तो उसकी खुशबू पहले से अधिक है और पकाने पर उसकी महक भी दूर तक जाती है। रासायनिक खाद चावल की सुगंध और गुणवत्ता दोनों को कमजोर कर देता है। इसके साथ ही जैविक खाद से उत्पादित चावल का दाम भी बाजार में अधिक मिलता है।

जैविक खाद की डिमांड अधिक होने से किसान अब उसे अपने घर पर ही बना रहे हैं। इसके चलते वह पशु पालन की ओर भी अधिक छुकाव ले रहे हैं। पहले की अपेक्षा अब किसानों के पशुओं की संख्या भी बढ़ गई है। उनके गोबर से वह जैविक खाद का निर्माण कर रहे हैं। प्रगतिशील किसान डॉ. टीकम सिंह साहू ने बताया कि उनके पूर्वज गोबर की खाद का उपयोग खेती में करते थे। समय के साथ बदलाव होने पर किसानों ने रासायनिक खाद का उपयोग किया, लेकिन उससे उन्हें पहले अच्छी पैदावार मिली और फिर जमीन की उर्वरा शक्ति कम होने से उपज कम होती चली गई। राज्य शासन की नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना भी किसानों को जैविक खेती की ओर ले जा रही है।

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