किसानों का सम्मान:टीकरी बॉर्डर पर 365 दिन डटे रहे 8 किसान; जीतने की जिद्द ने जाने नहीं दिया घर
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किसान आंदोलन को एक साल पूरा होने पर शुक्रवार को बहादुरगढ़ के सेक्टर-13 में चल रही महापंचायत में उन 8 किसानों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने सालभर में एक बार भी घर जाकर नहीं देखा। भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहा) ने महापंचायत के मंच पर इन किसानों को शॉल भेंट की। कृषि कानूनों की वापसी के ऐलान से उनकी आंखें खुशी से भर आईं। साथ ही ऐलान किया कि कानून रद्द होने के नोटिफिकेशन के बाद ही घर जाएंगे।

बता दें कि दिल्ली बॉर्डर पर किसान आंदोलन को एक साल पूरा हो गया है। एक साल में किसानों ने रोटेशन पॉलिसी अपनाकर आंदोलन को मजबूत बनाए रखा। लेकिन कुछ किसान ऐसे भी रहे, जो पूरे एक साल तक दिल्ली बॉर्डर पर डटे रहे। एक साल में एक बार भी घर नही गए। आंदोलन के लिए जब पंजाब के गांव से चले थे तो यह कहकर चले थे कि या तो जीत कर आएंगे या फिर किसानी झंडे में लिपटकर आएंगे। ऐसे ही 8 किसानों को टीकरी बॉर्डर पर हुई किसान महापंचायत में सम्मानित किया गया।

एक साल के संघर्ष को याद करते हुए किसान देशा सिंह ने बताया कि आंदोलन के एक साल में करीब 700 किसानों ने जान गंवाई है। हरियाणा के किसानों ने उनका साथ दिया, सम्मान किया और आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। उन्होंने घरवालों को भी बोल दिया था कि या तो जीतकर आऊंगा या फिर किसानी झंडे में लिपटकर ही आऊंगा। किसान देशा सिंह का कहना है कि जीत की खुशी है। किसान गुरबचन सिह का कहना है कि जीत गए हैं, पर अभी घर नहीं जाएंगे, क्योंकि पूरी जीत अभी बाकी है।

जीतने की जिद्द ने घर नहीं जाने दिया

एक साल पहले दिल्ली के बॉर्डर पर पहुंचे किसानों को रास्ते में पुलिस की लाठियां, आंसू गैस के गोले और पानी की बौछारें भी झेलनी पड़ी हैं। जीतकर घर जाने की जिद्द ने दिल्ली बॉर्डर पर रहने का हौसला बनाए रखा। किसान मनप्रीत ने कहा कि बॉर्डर पर उन्हे दिक्कतें तो आई, घर वालों की याद भी आई, लेकिन जीतने की जिद ने घर नहीं जाने दिया। घरवाले ही यहां दिल्ली बॉर्डर के मोर्चे पर उनसे मिलने आए थे। अब जीत की खुशी है और साथी किसानों को खोने का गम भी। अब घर वापस तब जाएंगे, जब मोर्चा पूरी तरह से खत्म होगा।

संघर्ष को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया

कृषि कानूनों की वापसी के इस संघर्ष को किसान यूनियनों ने योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया है। खेती किसानी का काम प्रभावित न हो, इसलिए रोटेशन के आधार पर किसानों को घर भेजा गया और घर से वापस बुलाया गया। लेकिन संघर्ष में उन किसानों का योगदान सबसे अहम रहा, जो पूरे साल में एक बार भी घर नहीं गए।

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