गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को बड़े निजी स्कूलों में प्रवेश दिलाने की व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि करीब 400 स्कूलों में एक भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ। कोर्ट ने इस स्थिति पर आश्चर्य जताते हुए पूछा कि क्या सरकार किसी महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाने का प्रयास कर रही है। इस टिप्पणी के बाद शिक्षा व्यवस्था और आरटीई (शिक्षा का अधिकार) कानून के क्रियान्वयन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
मामला उन प्रावधानों से जुड़ा है जिनके तहत निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समुदाय के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं। सरकार का उद्देश्य यह है कि गरीब परिवारों के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिल सके। लेकिन अदालत के सामने प्रस्तुत आंकड़ों में यह सामने आया कि सैकड़ों स्कूलों में एक भी आवेदन नहीं पहुंचा, जिसने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और जागरूकता पर सवाल खड़े कर दिए।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि इतने बड़े स्तर पर आवेदन नहीं आ रहे हैं, तो यह केवल सामान्य प्रशासनिक समस्या नहीं मानी जा सकती। अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या पात्र परिवारों तक योजना की जानकारी सही तरीके से पहुंचाई गई थी या नहीं। साथ ही यह भी पूछा गया कि आवेदन प्रक्रिया को लेकर कहीं तकनीकी या प्रशासनिक बाधाएं तो उत्पन्न नहीं की गईं।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिए कि यदि सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो मामले में और कड़ी टिप्पणियां की जा सकती हैं। न्यायालय ने कहा कि शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका वास्तविक लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक है। यदि गरीब बच्चों को आरक्षित सीटों पर प्रवेश नहीं मिल रहा, तो यह कानून की मूल भावना के विपरीत है।
इस मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि कई बार गरीब परिवारों को आवेदन प्रक्रिया की जानकारी नहीं मिल पाती या ऑनलाइन आवेदन प्रणाली उनके लिए जटिल साबित होती है। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में डिजिटल संसाधनों की कमी भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आती है। इसके अलावा कुछ मामलों में यह आरोप भी लगते रहे हैं कि निजी स्कूल आरटीई के तहत प्रवेश प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त सहयोग नहीं करते।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं और सभी जिलों को आवश्यक निर्देश जारी किए गए हैं। हालांकि कोर्ट ने कहा कि केवल निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव भी दिखाई देना चाहिए। अदालत ने संबंधित विभागों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि पात्र बच्चों तक योजना की जानकारी पहुंचे और आवेदन प्रक्रिया सरल एवं सुलभ बनाई जाए।
यह मामला देश में शिक्षा के अधिकार और सामाजिक समानता की दिशा में चल रहे प्रयासों की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से कदम उठाएगी, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भी बेहतर शिक्षा पाने का समान अवसर मिल सके।

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