द्वादश ज्योतिर्लिंग अर्धनारीश्वर प्राणप्रतिष्ठा एवम श्री शिव महापुराण कथा.....
त्वरित ख़बरें - निशा बिस्वास छत्तीसगढ़ ब्यूरों

व्यक्ति को जीवन में कपट नहीं करना चाहिए कपट संसार में सब चीज़ तो दिला सकता है पर भगवान नहीं...

राजनांदगांव- ग्राम मुड़पार में समस्त ग्रामवासी के शुभ संकल्प एवम् सर्वजन कल्याणार्थ  द्वादश ज्योतिर्लिंग अर्धनारीश्वर प्राणप्रतिष्ठा एवम शिव महापुराण के चतुर्थ दिवस कथा वाचक आचार्य रामप्रताप शास्त्री जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति को जीवन में कपट नहीं करना चाहिए कपट संसार में सब चीज़ तो दिला सकता है पर भगवान नहीं इसलिए प्रत्येक व्यक्ती को कपट रहित होना चाहिए जीवन में जिसके कपट रहता है उसको भगवान पसंद नहीं करते भगवान स्वयं कहते हैं “निरमल मन जन सो मोहिं पावा। मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।” इसलिए कपट रहित होकर भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए कथा का विस्तार करते हुए पुज्य शास्त्री जी ने भगवान शिव और माता सती का प्रसंग सुनाया। शास्त्री जी ने कहा दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियां गुणवान थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे कि उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो जो सर्वशक्ति संपन्न एवं सर्व विजयी हो।

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वे ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा कि मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करुंगी। मेरा नाम होगा सती और मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करुंगी। भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया और वो सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थी। बाल्य अवस्था में ही ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए कि जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी आश्चर्य हुआ। जब सती विवाह योग्य हो गई तो दक्ष को उसके लिए वर की चिता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श लिया तो ब्रह्मा जी ने कहा कि सती आद्या की अवतार है। आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। उसके विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया और सती ने कैलाश में भगवान के साथ खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत किया। साफ है कि शिव जी की पूजा से वे खुद को ही सौंप देते हैं।

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