AI का खतरनाक साइड इफेक्ट? बिजली-पानी की भारी खपत पर दुनिया में बवाल
त्वरित खबरे : सौरभ

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने दुनिया को नई तकनीकी ऊंचाइयों तक पहुंचाया है, लेकिन इसके बढ़ते उपयोग के साथ एक नई चिंता भी सामने आ रही है। AI मॉडल को चलाने और प्रशिक्षित करने के लिए विशाल डेटा सेंटरों की जरूरत पड़ती है, जो भारी मात्रा में बिजली और पानी की खपत करते हैं। हाल के वर्षों में AI आधारित सेवाओं की मांग बढ़ने के कारण दुनिया भर में नए डेटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। हालांकि, इन परियोजनाओं को लेकर कई देशों में विरोध भी शुरू हो गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, डेटा सेंटरों में लगे हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं और उन्हें ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, इन केंद्रों को संचालित करने के लिए भारी बिजली की आवश्यकता होती है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि AI का विस्तार इसी गति से जारी रहा, तो वर्ष 2030 तक डेटा सेंटरों की पानी की खपत इतनी बढ़ सकती है कि वह 1.3 अरब लोगों की वार्षिक जल आवश्यकताओं के बराबर हो जाए।

अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय और पर्यावरण संगठन डेटा सेंटर परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन परियोजनाओं से भूजल स्तर पर दबाव बढ़ेगा, बिजली की मांग में इजाफा होगा और पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है। कई स्थानों पर लोगों ने प्रशासन से नए डेटा सेंटरों की अनुमति पर पुनर्विचार करने की मांग भी की है।

तकनीकी कंपनियां दावा कर रही हैं कि वे ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और पानी की खपत कम करने के लिए नई तकनीकों पर काम कर रही हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि AI के विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी बराबर ध्यान देना होगा। आने वाले वर्षों में AI और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती बन सकता है। AI जहां विकास और नवाचार का प्रतीक है, वहीं इसकी बढ़ती संसाधन खपत ने भविष्य को लेकर नई बहस भी छेड़ दी है।

YOUR REACTION?

Facebook Conversations