रामायण की मंथरा की कहानी : एक थप्पड़ से आंख खराब हुई

त्वरित खबरे - डॉक्टर के गलत इंजेक्शन से मारा लकवा, बहन ने तोड़ा घर, 3 दिन तक घर में सड़ती रही लाश

रामायण की मंथरा यानी ललिता पवार का आज ही के दिन नासिक में जन्म हुआ था। ललिता ने अपने करियर में कई फिल्में कीं, लेकिन उन्हें आज भी लोग रामायण में मंथरा के नाम से जानते हैं। ललिता एक साधारण परिवार से थीं जहां उन्हें कभी स्कूल भी नहीं जाने दिया गया। ललिता के करियर की शुरुआत चाइल्ड आर्टिस्ट से हुई जिसके बाद फिल्मों में उन्हें लीड रोल मिले और बाद में वो एक मशहूर विलेन बनीं। आज हम जानेंगे उनकी जिंदगी के बारे में...

मंदिर में हुआ जन्म

18 अप्रैल 1916 को नासिक में जन्मी ललिता 80 के दशक की पॉपुलर हीरोइन थीं। उन्होंने 70 सालों तक अलग-अलग रोल निभाकर बॉलीवुड में अपनी छाप छोड़ी है। ललिता पवार के पिता लक्ष्मणराव सगुन बिजनेस करते थे। कहा जाता है कि जब ललिता की मां प्रेग्नेंट थी तब अंबा देवी के मंदिर गई हुई थी वहीं पर उन्हें प्रसव पीड़ा हुई और मंदिर के बाहर उनका जन्म होने के कारण उनका नाम अंबिका लक्ष्मणराव सगुन रखा गया।

पहली फिल्म के लिए मिले थे 18 रुपए

ललिता पवार कभी स्कूल नहीं गईं। कहा जाता है उस वक्त लड़कियों का स्कूल जाना ठीक नहीं माना जाता था इसलिए ललिता को भी कभी स्कूली पढ़ाई का मौका नहीं मिला। लेकिन ललिता बेहद होशियार थीं जिसके चलते 9 साल की उम्र में ही उन्हें फिल्म राजा हरीशचंद्र से डेब्यू करने का मौका मिल गया। ललिता ने इस फिल्म में बहुत ही छोटा सा रोल किया था लेकिन उनका रोल इतना प्रभावी था उन्हें इसके बाद एक से बढ़कर एक फिल्में मिलने लगीं।


16 साल की उम्र में बनाई फिल्म

ललीता कुछ सालों में ही इतनी कामयाब हो गईं थीं कि उन्होंने 16 साल की उम्र में एक फिल्म बना डाली। जिसका नाम था कैलाश। ये एक साइलेंट फिल्म थी। इसके बाद उन्होंने फिल्म दुनिया क्या कहे भी बनाई। इस दौरान उन्होंने एक्ट्रेस के तौर पर कई हिट फिल्मों में काम भी किया। ललिता पवार उस दौर में सबसे कामयाब एक्ट्रेसेस में से एक थीं।

एक थप्पड़ ने बदल दी जिंदगी

ललिता उस दौरान बुलंदियों पर थीं वो एक खुबसूरत और कला की धनी एक्ट्रेस थी जिसके पास कई फिल्मों में काम करने का ऑफर था तभी 1942 में उन्हें चंद्र राव की पिक्चर 'जंग-ए-आजादी' में भगवान दादा को डायरेक्शन का काम मिला। भगवान दादा ने ललिता को फिल्म की लीड एक्ट्रेस के रोल में चुना। उस समय ललिता कोल्हापुर में एक मराठी फिल्म की शूटिंग कर रहीं थीं। लेकिन फिल्म की शूटिंग के लिए भगवान दादा उन्हें मुंबई लेकर आ गए। फिल्म की कहानी गांव में दो मुखिया की थी। ललिता मुखिया की बेटी का रोल प्ले कर रहीं थीं। शूट शुरू हो गया। सीन था एक मुखिया दूसरे मुखिया की लड़की को उठा ले जाएगा। इस सीन में भगवान दादा को ललिता को थप्पड़ मारना था। लेकिन उन्होंने इतनी जोर से थप्पड़ मारा कि ललिता बेहोश हो गईं। लोगों को लगा की शूटिंग के लिए ललिता बेहोशी का नाटक कर रहीं हैं लेकिन ललिता के कान से खून निकलने लगा। जिसके बाद उन्हें तुरंत हॉस्पिटल से जाया गया।

गलत दवा के रिएक्शन ने मारा लकवा

जब ललिता का इलाज चल रहा था तभी डॉक्टर द्वारा दी गई गलत दवा के नतीजे में ललिता पवार के शरीर के दाहिने भाग में लकवा मार गया। इसी लकवे की वजह से उनकी दाहिनी आंख पूरी तरह सिकुड़ और चेहरा खराब हो गया। इस घटना के बाद भगवान दादा ने दूसरी एक्ट्रेस को लेकर फिल्म बना ली साथ ही ललिता के हाथ से दूसरे प्रोजेक्ट्स भी चले गए। ललिता को कई सालों तक किसी ने काम नहीं दिया।

अंबा ऐसे बनीं ललिता

ललिता को ठीक होने में 3 साल का समय लग गया था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे फिल्मों में वापसी करना चाहतीं थीं लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा था। एक दिन उनके गुरु उनसे मिलने पहुंचे। बातचीत में ललिता पवार ने अपने दिल की बात उनके सामने रखी। उनके गुरु ने उनकी बात सुनकर कहा, अब तुम्हें नई पहचान बनानी होगी वो भी नए नाम के साथ। ललिता भी जानतीं थीं कि लेफ्ट आंख खराब होने के बाद उन्हें लीड एक्ट्रेस के तौर पर कोई काम नहीं देगा। ललिता ने अपने गुरु की बात मानी और नए नाम और नई पहचान के साथ इंडस्ट्री में वापसी की। इस दौरान उनका नाम पड़ा ललिता पवार। उनकी दूसरी पारी 1948 में एक मुंदी आंख के साथ फिल्म गृहस्थी से शुरू हुई। इसके बाद उन्हें जालिम सास के रोल मिलने लगे। लेकिन उन्होंने इन मौकों को हाथ से जाने नहीं दिया। इस दौरान उन्हें अनाड़ी, मेम दीदी, श्री 420 जैसी हीट फिल्मों में काम किया। ललिता पवार को 1987 में रामानंद सागर की टीवी पर आई रामायण में निभाए गए मंथरा के रोल के लिए आज भी याद किया जाता है। इस रोल को ललिता ने अपने हुनर से जीवित कर दिया था। ललिता की आखरी फिल्म लाश थी।

पति का छोटी बहन से था अफेयर

ललिता की पर्सनल लाइफ की बात करें तो उनके पहले पति गणपत ने उन्हें धोखा दे दिया था। गणपत को ललिता की छोटी बहन से प्यार हो गया था। जिसका पता ललिता को चला तो उन्होंने गणपत को छोड़ दिया। बाद में उन्होंने फिल्म निर्माता राजप्रकाश गुप्ता से शादी की। जिनसे उन्हें एक बेटा हुआ।

3 दिन तक सड़ती रही लाश

अपने करियर में 700 फिल्मों में अभिनय के जौहर दिखाने वाली इस एक्ट्रेस का अंत दर्दनाक हुआ। ललिता ने 24 फरवरी 1998 को पुणे में अपने छोटे से बंगले 'आरोही' में अकेले ही पड़े-पड़े आंखें मूंद लीं। उस समय उनके पति राजप्रकाश अस्पताल में भर्ती थे और बेटा अपने परिवार के साथ मुंबई में था। उनकी मौत की खबर तीन दिन बाद तब मिली जब बेटे ने उन्हें फोन किया और किसी ने नहीं उठाया। घर का दरवाजा तोड़ने पर पुलिस को ललिता पवार की तीन दिन पुरानी लाश मिली थी।

एक्ट्रेस के साथ बेहतरीन सिंगर भी थीं ललिता पवार

उस समय अभिनेत्रियों को अपने गाने खुद गाने पढ़ते थे इसलिए ललिता पवार ने बाकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी ली थी। बुलंद आवाज की धनी होने के कारण उन्होंने कई फिल्मों में गाने गाए। 1935 में आई फिल्म हिम्मते में उनका गाया गीत- नील आभा में प्यारा गुलाब रहे मेरे दिल में प्यारा गुलाब रहे... काफी लोकप्रिय हुआ था। इसके अलावा उन्होंने कई फिल्मों में अपने गाने खुद गाए।