राजनांदगांव - रंगमंच, नाटकों के संदर्भ में कुछ लिखने से पहले मुझे लगता है कि अभिनय के अवधारणा के सम्बंध में हमें इतिहास की गर्भ में झांकना अनिवार्य सा प्रतीत होता है। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में रंगमंच और अभिनय के बारे में जो बातें कही गई है- "अभिनय का ना करना ही अभिनय है।" अर्थात दर्शकों को ये कतिपय ना लगे कि हम किसी अभिनय को देख रहे हैं, उन्हे लगे कि घटना जीवंत घटित हो रही है।
और अभिनय करने वाले पात्र कलाकार को हमेशा पात्र अनुरूप अपने मूल व्यवहार को त्याग कर काल्पनिक पात्र को अपने अंदर स्थापित कर लेना चाहिए।
राष्ट्रीय स्तर के बड़े नाटककार ब.व. कारंत का यह कथन उल्लेखनीय है कि - "नाट्यकला तो वेश्या है, नई-नई कलाओं से सम्बंध रखना, तोड़ना और फिर जोड़ना इसका धर्म है।" अर्थात हम जिस कैरेक्टर को अभिनीत कर रहे हैं उस पात्र में ही पुरी तरह अपने मूल व्यवहार को भूल कर जीवंत प्रस्तुतीकरण करें।
छत्तीसगढ़ में रंगमंच को किसी ने अगर वैश्विक पटल पर लेकर गये तो वो है एक बड़ा नाम जो लोकधर्मी रंगमंच का संवाहक थे, जो छत्तीसगढ़ को एक नई पहचान दिया और अपनी परख से कई और नये कलाकार तरासे, जिन्हें हम पद्मविभूषण हबीब तनवीर जी के नाम से जानते हैं।
लेकिन अभी वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ में तनवीर जी के पद चिन्हों पर चलने वाले और छत्तीसगढ़ की मान प्रतिष्ठा को विश्व की कपाल तक पहुंचाने के लिए आज भी बहोंत से कला साधक अग्रसर हैं। जो रंगमंच के क्षेत्र में अपनी एक अलग दुनिया गढ़ रहे हैं और अभिनय को अपनी साधना मानते हैं। इन्ही नामों में एक नाम है जो रंगमंच की घटती लोकप्रियता के बीच भी आज भी अपनी संघर्षशीलता से नाटक को जन-जन तक स्थापित करने के लिए सराहनीय कार्य कर रहे हैं।
दुर्गेश सिन्हा दुलरवा राजनंदगांव की ओर से जन्म दिन विशेष
मैं बात कर रहा हूं रंगकर्मी डॉ. योगेंद्र चौबे जी के बारे में जो रायगढ़ के छोटे से मोहल्ले बेलादुला से अपने सपनों के पंख लगाकर आसमानों की ऊँचाई को छूने के लिए अग्रसर हुए और नाटक के प्रति उनका आत्मीय लगाव ही था कि उन्हे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली तक खींच ले आई और फिर वहाँ पढ़ते हुए परिकल्पना एवं मंच तकनीक में विशेषज्ञता सहित स्नातक की शिक्षा प्राप्त किये। घर वाले पेशे से उन्हे वकील बनाना चाहते थे और वकालत का भी पढ़ाई किया, लेकिन इनका मन तो कहीं और केंद्रित था। और निरंतर संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ते रहे। उनकी यही लगन ही उन्हे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से फेलोशिप दिलाई। आप ने छत्तीसगढ़ के प्रमुख घुमन्तू देवार जनजाति के जिंदगी पर गहन शोध कार्य भी किये। ये उनके मिट्टी से जुड़े लगाव का ही परिणाम है कि बहोत कम उम्र में ही दूरदर्शन तक का सफर तय कर लिया और दूरदर्शन में निर्मित टेलीफिल्म "धरती अब भी घूम रही है" के लिए कला निर्देश किया। और आज निरंतर रंगमंच को नया दिशा देने के लिए स्वयं "गुड़ी" जैसे नाट्य संस्था का स्थापना कर ग्रामीण स्तर के कलाकारों में रंगमंच की सम्भावनाओं को एक नया आकार दे रहे हैं और नई पीढ़ी तैयार कर रहे हैं। गुड़ी के कलाकारों के साथ नाटक के बड़े मंचों में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करते हुए नाटकों का मंचन राष्ट्रीय स्तर पर देश के विभिन्न नामचिन मंचों पर नाटकों का मंचन कर रहे हैं।
आपके जीवन में एन.एस.डी. के निदेशक रहे श्री देवेंद्रराज "अंकुर" जी का प्रभाव व प्रेरणा हमेशा दिखाई देता है। आप अगर चाहते तो अपनी रंगमंच की दुनिया औरों की तरह बना सकते थे लेकिन आपके मन में तो अपने जैसे कलाकारों को दिशा देने का जज़्बा था ताकि छत्तीसगढ़ के युवा जो इस क्षेत्र में अपना मुकाम बनाना चाहते हैं उन्हें भटकना न पड़े कुछ इसी सोच आप एशिया महाद्वीप में अपने तरह की खास संगीत विश्वविद्यालय के रूप में ख्याति प्राप्त इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के नाट्य विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में अध्यापन का कार्य कर रहे है और नाट्य विभाग को स्थापित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आप मानसिंग तोमर संगीत एवं कला विश्विद्यालय ग्वालियर (म. प्र.) के ड्रामा विभाग में भी विभाग प्रमुख रहे है। आप निरन्तर रंगमंच को नये प्रतिभा निखार कर दे रहे है और निरंतर रंगमंच को नये प्रतिभा निखार कर दे रहें हैं। आपके सानिध्य और मार्गदर्शन में थियेटर के बारीकियों की समझ स्थापित कर आज आपके शिष्य नई पौध के रूप में न केवल एन.एस.डी. जैसे बड़े संस्थानों तक पहोंच बना रहे हैं बल्कि उनके विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर की फेलोशिप, स्कालरशिप प्रोडक्शन ग्रांट नाट्य समारोहों में शिरकत तथा जे.आर.एफ.एस. आर. एफ. फैलोशिप, नेट की परीक्षा तक सफलता पूर्वक निकाल रहे हैं व रंगमंच से लेकर फिल्मों तक का सफर तय कर रहे हैं। वास्तविक धरातल पर भी आपकी कार्यकुशलता और रंगमंच के प्रति आपका समर्पण दिखाई भी देता है। आप लेखन कार्य में भी अपनी विचारों का प्रसार कर रहे है और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। आप में लोकनाट्य नाचा के प्रति भी आकर्षण दिखाई देती है जो आपके नाटकों में लोकधर्मिता के सांथ हमेशा दिखती है। आपके द्वारा लिखित पुस्तक "रंगमंच परम्परा और प्रयोग" में भी छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के बारे में कलम चलती हुई दिखाई देती है, जो आने वाले भावी नाटककारों के लिए छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य को समझने में सहायक होगा।
आप रंगमंच से छत्तीसगढ़ी फ़िल्म तक की सफर भी तय किये है, जहाँ छत्तीसगढ़ की फ़िल्म उद्योग को एक नया मुकाम और लिग से हट कर कुछ नया करने वा जमीनी स्तर की समस्याओं को सिनेमाई पर्दे पर उतारने की नई समझ स्थापित किए है। आप ने साबित किये है कि सिनेमा केवल मनोरंजन ही नही बल्कि समाज में लोगों की सोच में परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम है। देश के सुप्रसिद्ध कथाकार अमृता प्रीतम की मूल कहानी जो महिला सशक्तिकरण और नारी अस्मिता पर केंद्रित है, ये फ़िल्म एक विद्रोही लड़की की कहानी है, जो हमारे समाज में यदा -कदा दिखाई देती है। जहाँ एक उम्रदराज मर्द के साथ यह कह कर शादी कर दी जाती है कि "मर्दों का उम्र नही देखा जाता बल्कि उसका गुण और सम्पत्ति देखा जाता है।" और इसका विरोध करती हुई नायिका हम सब के लिए एक सवाल छोड़ जाती है कि "नारी कोई गांजे की कली नही, जो कोई भी रगड़ कर पीले।" यंही से फ़िल्म को शीर्षक नाम मिलता है "गांजे की कली" और हमें सोचने के लिए विवश कर देती है कि क्या कोई पिता अपने पुत्र का विवाह किसी वृद्ध महिला के साथ करने के लिए तैयार होगा? नही न, तो फिर लड़कियों के साथ ऐसा क्यों? यही कारण है कि इस फ़िल्म को राष्ट्रीय स्तर के बड़े मंचों पर फ़िल्म निर्देशन से लेकर कलाकारों के अभिनय को काफी सराहना मिली। साथ ही फ़िल्म समीक्षकों के बीच काफी चर्चा में भी रहे। छत्तीसगढ़ की यह पहली फिल्म जो नेशनल अवार्ड के लिए गई थी एवं जागरण फिल्म फेस्टिवल में चयन हुआ और दिल्ली मुंबई रायपुर सहित कई बड़े शहरों में इस फ़िल्म का प्रदर्शन किया हुआ। निर्देशक अगर चाहते तो इस फिल्म को हिन्दी में बना सकते थे और एक बड़ा व्यवसाय आर्थिक रूप से कर सकते थे लेकिन ये उनका छत्तीसगढ़ के प्रति लगाव ही है की जिस छत्तीसगढ़ के घटना पर आधारित यह मूल कहानी लिखी गई थी उसी के अनुरूप फिल्म को बना कर छत्तीसगढ़ के लोकगीतों के साथ कंही-कंही पर निर्देशक स्वंय अपना आवाज देकर फिल्मांकन किया है। 90 मिनट की यह फ़िल्म मई 2020 से अब यूट्यूब पर भी उपलब्ध हैं जिसे फिल्म के शीर्षक "गांजे की कली" या निर्देशक योगेंद्र चौबे के नाम से देखा जा सकता है।
छत्तीसगढ़ में एक अलग तरह का का कार्य करने व देश विदेश में अपनी पहचान बनाने के कारण आपको सिम्बोसिस यूनिवर्सिटी ने फुटप्रिंट अवार्ड से सम्मानित किया। रंगमंच के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए आपको इसी वर्ष अभिनव रंगमण्डल उज्जैन द्वारा "राष्ट्रीय रंग सम्मान" से सम्मानित किया गया। इसके पूर्व आपको "ग्वालियर गौरव सम्मान" से भी सम्मानित किये गये हैं। और इस सम्मान को अपनी कलासाधना और प्रतिभा से अपने नाम किये है।
मैंने अपने विद्यार्थी जीवन के अध्ययनकाल में एक वर्ष तक ऐसे रंगकर्मी व पारखी का सानिध्य प्राप्त किया और नाटक के बारीकियों व लेखन कौशल को बहुंत कम समय में आपसे सीखने, जानने व समझने का अवसर प्राप्त किया। जो मुझे इस छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ी समस्याओं को लेकर लेखन करने और फिल्मांकन की परिकल्पना करने के लिए प्रेरित करती है और मेरी आने वाली छत्तीसगढ़ी शार्ट फ़िल्म "पिरित के सपना" में छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों की पीड़ा के साथ दिखाई भी देगी।
आलेख
दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
राजनांदगांव