बाग नदी को लेकर ग्रामीणों की मांग ,

त्वरित ख़बरें - किसानों भाईयों को इसका लाभ सूखे जैसे स्थिति निर्मित होने पर सिंचाई हेतु मिल सके और उनके आय में वृद्धि हेतु प्रमुख फसल धान के उपज में बढ़ोतरी हो सके ,

हरिप्रसाद सिन्हा जो की भर्कुरा के सरपंच हैं उन्होंने बाग नदी  डेम के बारे में चर्चा करते हुए सरकार से अपील किया हैं -

बाग नदिया वो टूरी झन जा मंझनिया वो बाग नदिया*

एक गीत जो वर्षों से छत्तीसगढ़ के फ़िजा में अपनी महक बरकरार रखे हुए है जिसे बार- बार सुनने और गाने का मन करता है। छत्तीसगढ़ के चर्चित फिल्मकार श्री प्रेम चंद्राकर द्वारा लिखित गीत जिसे अपने सुरों से सजाया है स्वर्गीय मिथलेश साहू और विदुषी पद्मश्री ममता चंद्राकर (वर्तमान कुलपति इंदिरा कला संगीत विश्विद्यालय खैरागढ़) ने। इस पुरे गीत में प्रकृति का ही वर्णन मिलता है ,चूंकि यह गीत छत्तीसगढ़ के ददरिया शैली में है। गीत के बोल "बागनदिया वो टूरी झन जा मंझनिया वो बाग नदिया" काफी चर्चित हैं , लेकिन बहुत ही कम लोगो को पता है इस गीत के बोल में उल्लेख हुआ यह बांध, जिसे सरकारी दस्तावेज में मनोहर जलाशय (भंडारा-गोंदिया से सांसद रहे प्रफुल्ल भाई पटेल के पिता संजय मनोहर) के नाम से जाना जाता है, लेकिन लोकल ग्रामीण इसे बागनदी डेम (बांध) एवं सिरपुर डेम के नाम से जानते हैं। बागनदी का उद्गम स्थल फुलझड़ पहाड़ी से माना जाता है। यह नदी गोदावरी नदी का सहायक नदी भी है। इस बागनदी डेम से कोटरा डेम में भी जल आपूर्ति किया जाता है। बांध में कुल सात गेट बनाये गये हैं। यह बांध जिला मुख्यालय राजनांदगांव से 65 किलोमीटर की दूरी पर महाराष्ट्र सीमावर्ती क्षेत्र बागनदी में स्थित है। अगर बात महाराष्ट्र से करे तो ये गोंदिया जिला के देवरी तहसील में है और इस बांध से ही देवरी के लिए पेयजल भी आपूर्ति की जाती है। गीत में जैसा कि उल्लेख है कि "झन जा मंझनिया वो बाग नदिया" अर्थात ये पुरा बांध जंगलों से घिरा हुआ है और गर्मी के दिनों में दोपहर को (मंझनिया के बेरा) यहाँ जाना अर्थात जंगली जानवरों का डर रहता है, क्योंकि इस बांध में बारहों महिने पानी की उपलब्धता रहती है, जिससे गर्मी के दिनों में जंगली जानवर बांध में अपनी प्यास बुझाने के लिए आते होंगे। पहले इस क्षेत्र के जंगल में बाघ का भी मौजूदगी हुआ करता था जिसके कारण ही इस नदी का नाम बागनदी होना माना जाता है।

            चलिए इस गीत के बहाने अब बात करते हैं इसके दूसरे पहलू के बारे में, जिसके लिए मूलतः यह बांध बनाया गया है। जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश में संयुक्त रूप से था उस समय इस जलाशय का निर्माण 1970 के आस-पास हुआ है और निर्माण के समय ही इस क्षेत्र के किसान इस बांध का विरोध करते रहे। बांध निर्माण प्रारंभ होने के बाद भी इसका कार्य बंद हो गया था जिसके बाद इस पर फिर से बात-चित कर इस बांध का निर्माण कार्य पूर्ण किया गया।

दरअसल इस बांध का 80 से 85 प्रतिशत जल भराव डुबान क्षेत्र छत्तीसगढ़ का जमीन है। लेकिन छत्तीसगढ़ का ये दुर्भाग्य है कि इसका नियंत्रण महाराष्ट्र सरकार के हाँथ में है और इस बांध का जल सिंचाई हेतु महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसानों को लाभ दिया जाता है। छत्तीसगढ़ निर्माण के इन 22 सालों में कई दफे इस क्षेत्र के ग्रामीण किसान इस मुद्दे को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और शासन प्रशासन के अधिकारियों से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक इसका गुहार लगा चुके हैं कि इस बांध में संग्रहित जल का लाभ सिंचाई हेतु इस क्षेत्र के किसानों के खेतों तक भी पहुंचाई जाये l लेकिन सरकारें बदलती रही पर क्षेत्र के किसानों की किस्मत आज तक नही बदल पाई। मैं अपने साथी लोकेश साहू के साथ जमीनी स्तर पर बांध के जलभराव को देखने के लिए बांध के डुबान क्षेत्र छुरिया विकासखंड के अलग-अलग ग्राम की ओर से जाकर देखा जिसमें पाया कि बागनदी जलाशय छत्तीसगढ़ के काफी बड़े भूखंड में फैले हुए हैं, जो अधिकांश रूप से पहाड़ों और जंगलों से घिरे हुए है। इस दिशा में किसानों के हित में सार्थक पहल की आवश्यकता है ताकि इस क्षेत्र के हमारे अपने किसानों भाईयों को इसका लाभ सूखे जैसे स्थिति निर्मित होने पर सिंचाई हेतु मिल सके और उनके आय में वृद्धि हेतु प्रमुख फसल धान के उपज में बढ़ोतरी हो सके , जिससे किसान आर्थिक रूप से अधिक सम्बल बन सके।

                आलेख

          दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"

           दुर्रे बंजारी छुरिया

     हरिप्रसाद सिन्हा सरपंच