महेश कुमार सैनी ने सालासर रोड पर चेलासी गांव में 5 साल पहले कामधेनु अस्पताल खोला।

त्वरित ख़बरें - इस हॉस्पिटल में गायों का इलाज होता है:कूलर- पंखे लगा रखे हैं,1000 गायों को ठीक कर चुके, हर महीना 5 लाख का खर्च

सड़क किनारे तड़पती बीमार-घायल गायों को देख एक कारोबारी का दिल इतना पसीजा कि उसने गायों के लिए अस्पताल ही खोल दिया। अस्पताल का नाम रखा- 'कामधेनु'। करीब 5 साल पहले शुरू हुआ यह सफर आज भी जारी है। कारोबारी के इस प्रयास को कई और लोगों का साथ मिला और अस्पताल का सफल संचालन होने लगा। पिछले 5 साल में यहां एक हजार गायों का इलाज किया जा चुका है। वर्तमान में डेढ़ सौ से ज्यादा गायों का इलाज चल रहा है। अस्पताल की अपनी एंबुलेंस भी है। जहां कहीं से भी गाय के बीमार होने या घायल होने की सूचना मिलती है, फौरन एंबुलेंस से उसे अस्पताल लाया जाता है। स्वस्थ होने के बाद गायों को गौशाला भेज दिया जाता है।

महेश कुमार सैनी प्रिंटिंग का बिजनेस करते हैं। उन्होंने कई बार सड़क पर तड़पती गायों को देखा। कोई बीमार होती थी तो कोई रोड एक्सीडेंट में घायल हो जाती थी। गायों की ऐसी दुर्दशा ने उन्हें विचलित कर दिया था। देखभाल नहीं होने पर गायों की मौत भी हो जाती थी। ऐसे में गायों का दर्द दूर करने के लिए उन्होंने अस्पताल खोलने का निर्णय किया।

परिवार और दोस्तों को इसके बारे में बताया। उन्होंने भी महेश की पहल का समर्थन किया। इसके बाद महेश ने कुछ रुपए घर से लिए और कुछ दोस्तों-परिचितों से सहयोग लिया। 2017 में सालासर रोड पर चेलासी गांव में 4 बीघा जमीन को किराए पर लेकर अस्पताल की नींव रखी ।

शुरुआत में 1 कंपाउंडर था

महेश ने बताया कि गांव और आसपास के इलाके में बीमार गाय की सूचना मिलने पर हम उसे अस्पताल लेकर आते हैं। शुरुआत में गायों के इलाज के लिए एक कंपाउंडर रखा था, जो 24 घंटे हॉस्पिटल में रहता था। धीरे-धीरे बीमार गायों की संख्या बढ़ने पर मेडिकल स्टाफ भी बढ़ा दिया। अब हॉस्पिटल में एक डॉक्टर और 18 लोगों का स्टाफ है। 7 से 15 हजार के बीच स्टाफ को हर महीने सैलरी दी जाती है। हर महीने 5 लाख रुपए का बजट खर्च हो रहा है।

ज्यादातर गाय एक्सीडेंट में घायल
हॉस्पिटल में करीब 150 गाय भर्ती हैं। ज्यादातर केस सड़क दुर्घटना में घायल गायों के हैं। कई गायों के घाव में कीड़े पड़े हुए हैं। उनका भी इलाज चल रहा है। अस्पताल में ऐसी गायें भी हैं, जिनको किसी असामाजिक तत्व ने तेजाब डालकर जलाने का प्रयास भी किया है।

                                           अस्पताल में बीमार और दुर्घटनाग्रस्त गायों का इलाज कर गौशाला भेजा जाता है।

परिवार ने दिया साथ
गौ सेवक ने बताया कि इस काम में पत्नी और दोनों बच्चों ने पूरा साथ दिया है। परिवार के सहयोग से हॉस्पिटल में ज्यादा समय दे पाते हैं। किसी भी समय बीमार गाय की जानकारी मिलने पर एंबुलेंस लेकर पहुंच जाते हैं। शुरुआत में घर से अस्पताल में पैसा लगाया गया था। धीरे-धीरे गांव के लोग और दानदाता भी साथ में जुड़ने लगे हैं। दान के रुपए से ही अस्पताल के स्टाफ और गायों की दवा का खर्च निकल रहा है।

हॉस्पिटल शिफ्ट करने का संकट
शुरुआत में चार बीघा जमीन का सालाना किराया 40 हजार रुपए था, जो अब एक लाख हो गया है। महेश ने बताया कि 6 साल से लगातार यहां सब मिलकर काम कर रहे हैं। अब जमीन को जून में खाली करना पड़ेगा। अस्पताल को दूसरी जगह शिफ्ट करने का संकट पैदा हो गया है।