बस्तर में टीबी से बड़ी चुनौती इलाज तक की दूरी, मरीजों की जान पर भारी पड़ रहा सफर...

त्वरित खबरें :- अमित यादव रिपोर्टिंग

बस्तर में टीबी से बड़ी चुनौती इलाज तक की दूरी, मरीजों की जान पर भारी पड़ रहा सफर

इलाज नहीं, अस्पताल तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में टीबी (तपेदिक) से लड़ाई सिर्फ दवाइयों की नहीं, बल्कि इलाज तक पहुंचने की दूरी की भी है। दूर-दराज़ आदिवासी इलाकों में रहने वाले मरीजों को जांच, दवा और फॉलो-अप के लिए कई किलोमीटर का कठिन सफर तय करना पड़ता है। कई गांवों में सड़क, एम्बुलेंस और परिवहन की सुविधाएं सीमित होने के कारण मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते।

दूरी बन रही जानलेवा

कई मरीजों को जंगल, कच्चे रास्तों और नदी-नालों को पार कर स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना पड़ता है। बरसात के मौसम में हालात और भी खराब हो जाते हैं। इलाज में देरी के कारण कई मरीजों की हालत गंभीर हो जाती है और कुछ मामलों में अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो जाती है।

मुफ्त दवा, लेकिन इलाज का खर्च भारी

हालांकि नेशनल टीबी एलिमिनेशन प्रोग्राम (NTEP) के तहत टीबी की दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं, लेकिन इलाज तक पहुंचना आसान नहीं है। हर बार जांच और दवा लेने के लिए मरीजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे यातायात का खर्च, दिहाड़ी का नुकसान और परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।

महिलाओं और आदिवासी परिवारों पर सबसे ज्यादा असर

रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी महिलाएं टीबी से सबसे ज्यादा प्रभावित वर्गों में शामिल हैं। सामाजिक संकोच, आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण वे अक्सर बीमारी छिपाती हैं, जिससे जांच और इलाज में देरी होती है। कई परिवार शुरुआत में पारंपरिक उपचार पर निर्भर रहते हैं, जिससे बीमारी और गंभीर हो जाती है।

विशेषज्ञों की राय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी का इलाज तभी सफल होगा, जब स्वास्थ्य सेवाएं मरीजों के करीब पहुंचें। सिर्फ मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। दूरस्थ गांवों तक जांच, दवा और नियमित स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना बेहद जरूरी है, ताकि मरीज समय पर इलाज शुरू कर सकें और बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके।

निष्कर्ष

बस्तर में टीबी से बड़ी चुनौती बीमारी नहीं, बल्कि इलाज तक की दूरी है। जब तक दूर-दराज़ के गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच नहीं बढ़ेगी, तब तक टीबी के खिलाफ लड़ाई अधूरी रहेगी और कई मरीज समय पर इलाज से वंचित होते रहेंगे।