CBSE की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, छात्रों पर बोझ को लेकर मांगा जवाब

त्वरित खबरें : अरुण रिपोर्टिंग

CBSE,की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यह जांच जरूरी है कि इस नीति को लागू करने से छात्रों, स्कूलों और उपलब्ध संसाधनों पर अनावश्यक दबाव तो नहीं पड़ रहा। 27 मई को हुई सुनवाई में CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने केंद्र सरकार, CBSE और NCERT को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी शिक्षा नीति को लागू करने से पहले उसकी जमीनी हकीकत और व्यवस्थागत चुनौतियों को समझना जरूरी है, खासकर तब जब कई स्कूलों में योग्य शिक्षकों और किताबों की कमी पहले से मौजूद है।

दरअसल CBSE ने 15 मई को सर्कुलर जारी कर 2026-27 सत्र से कक्षा 9वीं और 10वीं में थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी लागू करने का फैसला किया था। इसके तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। बोर्ड ने कहा है कि यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क 2023 के तहत लिया गया है। हालांकि CBSE ने यह भी स्पष्ट किया कि कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में तीसरी भाषा का अलग पेपर नहीं होगा। इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर आंतरिक रूप से किया जाएगा और उसका परिणाम छात्रों के अंतिम प्रमाण पत्र में दर्ज किया जाएगा।

इस नीति को चुनौती देते हुए छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि CBSE पहले खुद स्वीकार कर चुका है कि स्कूलों में प्रशिक्षित भाषा शिक्षकों और पाठ्य पुस्तकों की कमी है। इसके बावजूद इस सत्र से नियम लागू करना छात्रों पर अतिरिक्त बोझ डालने जैसा है। उनका यह भी कहना है कि नई शिक्षा नीति में साफ लिखा है कि किसी भी छात्र या राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी, जबकि वर्तमान सर्कुलर उसी भावना के खिलाफ दिखाई देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई 1 जुलाई को तय की है। इस फैसले का असर देशभर के करीब 50 लाख छात्रों पर पड़ सकता है। फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कोर्ट इस नीति को लेकर क्या अंतिम रुख अपनाता है और CBSE छात्रों की चिंताओं का क्या जवाब देता है।