राजनांदगांव. प्रगतिशील लेखक संघ राजनांदगांव इकाई द्वारा परसाई जी के जन्म शताब्दी पर स्थानीय सृजन संवाद भवन त्रिवेणी परिसर, मुक्तिबोध स्मारक राजनांदगांव में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संतोष्ठी की अध्यक्षता आलोचक प्रो. थानसिंह वर्मा ने किया। संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता डॉ. दादूलाल जोशी ने अपने संबोधन में कहा कि परसाई को याद करना आग की दरिया से गुजरना है, ऐसा उन्होंने इसलिए कहा कि आजादी के बाद नेहरू के विकास का मॉडल तथा समाजवाद का स्वप्न टूट रहा था और भारत में पूंजीवाद तथा साम्प्रदायिक फॉसीवाद अपना पैर जमा रहा था। आजादी के दौर का आदर्श और मूल्य का विघटन हो रहा था उसे परसाई जी ने बहुत सूक्ष्मता से देखा और बहुत तल्खी के साथ उस पर व्यंग्य किया है। उन्होंने कहा परसाई जी अपने समय के ही नहीं बल्कि आज भी हमारे बीच एक शिक्षक के रूप में अपनी रचनाओं के माध्यम से उपस्थित हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष प्रभात तिवारी ने अपने आलेख में परसाई जी की रचनाओं में विषय की विविधता और उसमें निहित यथार्थ को उदघाटित किया। उन्होंने ‘अकाल उत्सव’ निबंध में किस तरह किसान अपने फसल को बचाने के लिए पूजा करता है तो दूसरी ओर व्यापारी तथा पूँजीपति वर्ग अवर्षा के लिए पूजा करते हैं, अकाल की प्रतीक्षा करते है। परसाई जी ने धर्म की राजनीति, अर्थव्यवस्था, कर्मकाण्ड, अंधविश्वास का विरोध किया है।कथाकार कुबेर साहू ने कहा परसाई जी की दृष्टि बहुत व्यापक थी, ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां पर परसाई जी की दृष्टि नहीं गई होगी, परसाई जी की दृष्टि की मशीन एक्सरे मशीन की तरह दूर तक जाती थी यह उनकी गहन अध्ययनशीलता का प्रमाण है। परसाई जी जहां भी असंगत दिखता था उसका विरोध करते थे। यह चिंता का विषय है कि आज का मनुष्य इतना जड़ क्यों हो गया है।डॉ. शंकर मुनि रॉय ने परसाई जी से पहले भी व्यंग्य की परंपरा रही है लेकिन परसाई जी का व्यंग्य उनसे अलग है। परसाई जी के व्यंग्य में करूणा है। वे कहा करते थे कि जिस साहित्य में करूणा नहीं है, वह साहित्य नहीं है। उन्होंने ‘वैष्णव की फिसलन’ निबंध में धर्म को धंधे में कैसे बदल दिया जाता है उसकी व्याख्या की। युगल किशोर तिवारी ने कहा परसाई जी के व्यंग्य रचनाओं को समझने के लिए व्यापक अध्ययन तथा विकसित दृष्टि आवश्यक है।अंत में अध्यक्षीय उदबोधन में प्रो. थानसिंह वर्मा ने ’परसाई जी और आज के समय’ पर अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि परसाई जी ने अपने समय के समाज की विद्रुपताओं को देखकर जो कुछ लिखा है वह आज भी प्रासंगिक है। वे दूर दृष्ठा थे। कथाकार महेश कटारे ने यह ठीक ही कहा है कि परसाई जी संपाती की दृष्टि रखते है। परसाई जी ने अपने समय की राजनीति, धर्म, संप्रदाय, समाज में व्याप्त अंधविश्वास, अशिक्षा, अज्ञानता और इन सबके पीछे की जो शक्तियाँ हैं उन शक्तियों का चेहरा बेनकाब किया है। परसाई जी अपनी बात सूत्र रूप में कहते हैं और यह सूत्र लक्ष्य को बेधने वाले होते है। उन्होंने न्याय व्यवस्था और देश में धर्म, साम्प्रदायिकता से संबंधित कुछ उदाहरण दिये जैसे ‘झूठ बोलने के लिए सुरक्षित जगह अदालत है, वहाँ सुरक्षा के लिए भगवान और न्यायाधीश हाजिर होते हैं’, ‘दुनिया में कहीं गाय की पूजा नहीं होती इसलिए वह दूध देने के काम आती है-यहाँ गाय पूजी जाती है इसीलिए दंगे के काम आती है।’कार्यक्रम के आरंभ में प्रो. वर्मा ने कबीर के निर्गुण ’रहना नहीं देश बिराना रे ...’ गाकर सुनाया। कार्यक्रम में कैलाश श्रीवास्तव, आत्माराम कोशा, मुन्ना बाबू यादव, गिरीश ठक्कर, जयेश रामटेके, हरेन्द्र कंवर, डॉ. गजेन्द्र बघेल, कार्तिक साहू,राजकुमार चौधरी, ओमप्रकाश साहू, महेन्द्र बघेल, पवन यादव पहुना उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रवीण साहू ने तथा आभार ज्ञापन हरेन्द्र कंवर ने किया।