जिले के 10 सरकारी अस्पतालों का गंदा पानी अब सीधे नालियों में नहीं बहाया जाएगा। अस्पताल प्रबंधन गंदे पानी का ट्रीटमेंट कर बागवानी व साफ-सफाई के काम में उपयोग करेंगे। इसके लिए पहले जिले के जच्चा-बच्चा व लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल सहित 10 अस्पतालों में 1.49 करोड़ की लागत से ईटीपी (इफ्लूऐंस ट्रीटमेंट प्लांट) लगाया जा रहा है। दुर्ग में जच्चा-बच्चा अस्पताल व शास्त्री अस्पताल सुपेला में काम शुरू भी हो चुका है।
जिला अस्पताल समेत इन अस्पतालों में बनेगा ईटीपी
- जच्चा-बच्चा अस्पताल, दुर्ग
- शास्त्री अस्पताल, सुपेला
- सीएचसी पाटन
- सीएचसी झींट
- सीएचसी अहिवारा
- सीएचसी धमधा
- सीएचसी बोरी
- सीएचसी कुम्हारी
- सीएचसी उतई
- सीएचसी निकुम
जानिए, ईटीपी व उससे गंदे पानी की रिसाइकिल विधि
अस्पतालों से निकलने वाला गंदा पानी को बैक्टीरिया रहित करने वाले प्लांट को ईटीपी कहते हैं। इसके लिए उनकी पैथालॉजी, ओटी, सीवर का पानी इससे गुजारना होता है, जहां गंदा पानी शुद्ध (बैक्टीरिया रहित) होकर प्लांट के आगे के टैंक में स्टोर होता रहता है। फिर उसे बागवानी, साफ-सफाई में उपयोग करते हैं।
अस्पतालों में इस तरह काम करेगा यह पूरा सिस्टम
100 बिस्तर के अस्पताल के लिए बनाई जाने वाली ईटीपी में 13X37 फीट चौड़ा-लंबा व 7 फीट गहरा टैंक तैयार करते हैं। इसमें 8 खंड बनाया जाता है। पहले दो खंड में बैक्टीरिया और उसे ऑक्सीजन देने के लिए मशीन लगी होती है। इन्हीं दोनों टैंकों से गंदा पानी गुजारा जाता है। इससे वह बैक्टीरिया के संपर्क में आते ही शुद्ध हो जाता है।
ईटीपी काम कर रहा कि नहीं, यह ऐसे जान सकते हैं
14.88 लाख की लागत से बन रहे एक ईटीपी के काम को जानने के लिए अंतिम टैंक में स्टोर पानी की पांच जांच करानी होती है। जैसे उसका पीएच अगर 6.5 से 8.30 से ज्यादा, एसएस 100 एमजी/ली, सीओडी 250 एमजी/ली, बीओडी 30 एमजी/ली और गिरीश व आयल 10 एमजी/ली से कम होता है, तो पानी अशुद्ध माना जाता है।
10 अस्पतालों में ईटीपी लगाएंगे, दो में काम शुरू
दुर्ग की मदर चाइल्ड यूनिट व शास्त्री अस्पताल सुपेला सहित 10 सरकारी अस्पतालों में ईटीपी लगाने का काम हमें मिला है। मदर चाइल्ड यूनिट व सुपेला में काम शुरू करा दिया गया है। इसे बन जाने के बाद संबंधित अस्पताल का पूरा पानी गुजारते हैं। टैंक में डाले गए अच्छे बैक्टीरिया उस पानी को शुद्ध कर देते हैं।
-आरके मिश्रा, ऑनर, ईटीपी कार्यदायी संस्था