पं.बिरजू महाराज कत्थक जगत के सोशल इंजीनियर

त्वरित ख़बरें - दीपमाला शेट्टी रिपोर्टिंग

उन दिनों की बात है जब मैं पं. बिरजू महाराज जी से नृत्य की शिक्षा लेने के लिए कथक केन्द्र नई दिल्ली की ओर कूच किया। जी हाँ वर्ष 1990 से 1993 की बात है। मैं अपने प्रथम गुरू रायगढ़ दरबार के दरबारी कलाकार प्रो. कल्याण दास जी महन्त से अनुमति लेकर। महन्त गुरूजी ने बकायदा मेरे लिए महाराज जी के लिए पत्र लिखकर कि मैं अपने शिष्य (कृष्ण कुमार सिन्हा) को आपके पास नृत्य की शिक्षा के लिए सौंप रहा हूँ। मैं 1990 से लेकर आज 32 (बत्तीस) वर्षों तक महाराज जी का ही शिष्य रहा। यही कारण है कि, महाराज जी को छत्तीसगढ़ और राजनांदगांव से जुड़ाव रहा है।

महाराज जी हमेशा राजनांदगांव को "नंदगांव" कहकर संबोधित करते थे। मुझे महाराज जी एवं गुरू माता श्रीमती अन्नपूर्णा देवी जी, कृष्ण मोहन मिश्र, शाश्वती दीदी, जयकिशन महाराज एवं परिवार के लोग आज भी मुझे "किशन" संबोधित करते हैं। मैं डॉ. पी.डी. आर्शीवादम सर की प्रेरणा से पं. बिरजू महाराज जी के पिता स्व.पं. अच्छन महाराज जी के ऊपर शोधकार्य (पी-एच.डी.) करने का सौभाग्य मिला और इस कारण से मुझे महाराज जी एवं उनके परिवार के लोगों से अधिक स्नेह एवं प्यार मिला। महाराज जी अक्सर मुझे रविवार या छुट्टी के दिनों में अपने पास बुला लेते थे और अपने कत्थक नृत्य की विरासत और अपने पूर्वजों से जुड़े हुए घटनाक्रमों, पिता बड़े महाराज (अच्छन), मंझले चांचा लच्छू महाराज, छोटे चाचा शंभू महाराज जी की विशेषताओं और तालिमों के संदर्भ में चर्चा किया करते थे।

उन दिनों पं. बिरजू महाराज जी उत्तरप्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष थे। तब मुझे अक्सर महाराज जी लखनऊ लेकर चले जाते थे और इस प्रकार से मुझे अपने पी.एच.डी. के कार्यों को करने में आसानी हो जाती थी। महराज जी एवं शंभू महाराज जी की पत्नी फूल कुँवारी देवी जी व गुरू माता, श्रीमती अन्नपूर्णा देवी जी, कृष्ण मोहन भैया, शाश्वती दीदी, मुन्नी दीदी, भाश्वती दीदी, इस बात को समझते थे कि मैं एक गरीब एवं आर्थिक रूप से पिछड़े हुए परिवार से हूँ वे मुझे आर्थिक रूप से मदद भी करते थे। महाराज जी पक्के जौहरी थे। वे परख लेते थे उनके पास जो शिष्य नृत्य की शिक्षा लेने आ रहा है उसे किस प्रकार तालिम देना है और इस विधा को किस रूप में उनका शिष्य, समाज को देगा।

महाराज जी आधुनिक भारत के कत्थक जगत के सोशल इंजीनियर थे। वे अच्छे स्कील डेवलेपर थे। उन्होंने देश विदेश के हजारों कत्थक नृत्य सीखने वाले शिष्यों को प्रशिक्षित किया। पं. बिरजू महाराज जी आधुनिक रंगमंच में कत्थक नृत्य के शिल्पी थे। यह विरासत में प्राप्त लखनऊ घराने की स्र पंरपरा के अनुरूप तीनों महाराज बड़े महाराज़ (अच्छन) मंझले लच्छू महाराज और छोटे शंभू महाराज जी के नृत्य-अंगों से वे परिपूर्ण थे। पिता अच्छन महाराज जी की तैयारी और लयकारी, लच्छू महाराज जी का लास्य अंग और शंभू महाराज जी का ताण्डव अंग व भाव अंगों की त्रिधाराओं को आत्म सात कर पं. बिरजू महाराज ने नवाचार सृजनधर्मिता के साथ कत्थक नृत्य को समृद्धशाली नवीन अंग विन्यासों का प्रयोग कर अपने शिष्यों का स्कील डेवलप (कौशल उन्नयन) कर कत्थक नृत्य को समृद्धशाली बनाया है।

पं. बिरजू महराज जी का राजनांदगांव से लगाव- महराज जी राजनांदगांव को नन्दगाँव कहकर संबोधित करते थे। ऐसे महाराज जी चक्रधर कत्थक कल्याण केन्द्र, राजनांदगांव में मेरे निमंत्रण पर पाँच बार आये और चार बार पाँच दिवसीय अखिल भारतीय कत्थक नृत्य कार्यशाला में आकर हजारों नृत्य प्रशिक्षार्थियों को प्रशिक्षण देकर उनका कौशल उन्नयन किया। राजनांदगांव के नागरिकों के विशेष आग्रह पर पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज जी को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जी छत्तीसगढ़ शासन के तरफ से राज्य अतिथि का दर्जा दिया गया और यह सम्मान किसी कलाकार को छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद प्रथम बार रहा।

महाराज जी को राजनांदगांव की जनता द्वारा चार बार नागरिक अभिन्दन करते हुए दो बार लड्डुओं से तौला गया, महाराज जी की 75वीं वर्षगांठ अमृतोत्सव के अवसर पर 75 किलो घुंघरूओं से और एक बार पाँच सौ पारिजात के पौधों से तुलादान कर पं. बिरजू महाराज जी का • नागरिक अभिन्दन किया। इसी कारण से महाराज जी का राजनांदगांव से आत्मीय लगाव था। महाराज जी विभिन्न स्थानों बाम्बे, दिल्ली, कलकत्ता, इलाहाबाद के आयोजनों में अक्सर नन्दगाँव अर्थात राजनांदगांव का जिक्र करते थे। महाराज जी जब राजनांदगांव आये और राजनांदगांव के नागरिकों का स्नेह और प्यार देखा वे अभिभूत हो गये।

डॉ. कृष्ण कुमार सिन्हा (शिष्य) पं. बिरजू महराज जी, चक्रधर कत्थक कल्याण केन्द्र, राजनांदगांव (छ.ग.)