राजनांदगांव. सिक्ख धर्म-पंथ के संस्थापक सत्गुरू नानक देव जी के 555वें अवतरण दिवस की परम-पुण्य मंगल अवसर पर नगर के विचार प्रज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार द्विवेदी ने विश्व की अद्वितीय सनातन संस्कृति के आध्यात्म, दर्शन परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट विचार चिंतन में बताया कि अनुपम वाणी उपदेश-संदेश एवं ‘‘गुरूग्रंथ साहेब’’ के प्रणेता गुरू नानक जी - पवित्रता, प्रेम, नम्रता के परम दिव्य स्वरूप हैं। सामाजिक समता, शुद्धता, शांति और न्याय के अग्रदूत गुरू नानक जी ने सर्वदा ही सर्व जन-जन को एक परम परमेश्वर की मान्यता का अद्भूत संदेश दिया और बताया कि परमेश्वर ही सर्वश्रेष्ठ, सर्वकायी, अनंत सृष्टि का जनक समस्त कारणों का कारण, निर्वेर, निर्मत्सर, सर्वान्तर्यामी और सर्वातीत है। पृथ्वी पर जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य पावन प्राणी हेै और समानता का सहज अधिकारी है। डॉ. द्विवेदी ने आगे विशेष रूप से बताया कि अगाध, आध्यात्म शक्ति की प्रतिमूर्ति गुरू नानक जी का मूल संदेश - ईश्वर एक है, ईश्वर ही प्रेम है, ईश्वर संगठन स्वरूप है।, वह मंदिर में है।, वह तीर्थ स्थल में है। बाह्य प्रकृति सृष्टि में विद्यमान ईश्वर की दृष्टि में सारे मानव एक समान है। वे सब एक ही प्रकार जन्म लेते हैं और एक ही प्रकार से अंतकाल को भी प्राप्त करते है। ऊंच - नीच का वहाँ कोई स्थान नहीं है। ईश्वर भक्ति ही व्यक्ति-व्यक्ति का मूल कर्तव्य है। उसमें जाति-पंथ-रंग-भेद की कोई भावना नहीं है। वस्तुत: सत्गुरू की वाणी हमारे सनातन वैदिक संस्कृति का दर्शन-सार है। जिसका अनुकरण सर्व जन-जन को मंशा-वाचा-कर्मणा से करना ही चाहिए। यही श्रेष्ठ-सार्थक अर्थो में गुरू - प्रकाश पर्व का महत्तम संदेश होगा। आईये गुरूवाणी, रागी कीर्तनों का नित्य अवश्य श्रवण करें। विशेषकर युवा-किशोर-बाल पीढ़ी को सुनाएं-गवाएं। जय वाहे गुरू, वाहे गुरू - जय सतनाम।।