कहानी : प्रयास

त्वरित खबरे

  • बंटवारे ने सुहास को तोड़ दिया था। विकास को संपन्न घर से आ रही पत्नी के लिए सबकुछ मंज़ूर था।
  • खाई को बढ़ने से रोकने की कोशिश तो घर की बड़ी बहू सुरेखा कर ही रही थी, लेकिन इसे पाटेगा कौन? कहानी के आख़िरी वाक्य से जान पाएंगे आप।

सुरेखा बार-बार समझा रही थी लेकिन सुहास बोले जा रहा था, ‘कुछ नहीं बचा अब। साख मिट्टी में मिल गई। बारदाना ख़त्म हो गया। सालों की मेहनत पर पानी फिर गया है।’ सुरेखा ने दवाई हाथ पर रखकर पानी का गिलास दिया। ‘सुहास ईश्वर सब ठीक कर देंगे। अभी समय हमारे पक्ष में नहीं है। तुम ख़ुद को संभालो। तुम ठीक रहोगे तो सब ठीक हो जाएगा।’ दवाई लेकर सुहास फिर से बड़बड़ाने लगा। ‘कितने सालों से इस घर को संभालता आ रहा हूं। पापा के रहते रहते ज़िम्मेदारी सर पर ले ली थी लेकिन फिर भी किसी ने कुछ नहीं सोचा। भाई तो अपना निकला ही नहीं। मां और बहनें भी पराई हो गईं।’ रोते हुए उसने अपना सिर पकड़ लिया। सुरेखा ने उसे दोनों हाथों से पकड़ कर कुर्सी पर बैठा दिया और ख़ुद भी उसके पास ही पलंग पर बैठ गई। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि स्थिति को कैसे संभाला जाए। दीवार के दूसरी ओर शादी की तैयारियां चल रही थीं। मंगल गीत गाए जा रहे थे। सुरेखा जाना चाहती थी लेकिन सुहास को इस हालत में छोड़कर नहीं गई। सुहास को नींद आ गई थी और उसे पलंग पर लिटाकर सुरेखा रसोई में आ गई। खाना किसी ने नहीं खाया था। फ्रिज में खाना रखकर उसने मुंह धोया। आंखों के नीचे काले गड्ढे बता रहे थे कि वह कितने तनाव से गुज़र रही थी। ढोलक की थाप पर बन्ने गाए जा रहे थे। सुहास के पास वाली चारपाई पर लेट कर कब नींद लगी पता ही नहीं चला उसे। सुबह पानी भरने गई तो सीमा ने छेड़ा, ‘भाभी रात सुहाग गाने नहीं आई आप? हम तो इंतज़ार कर रहे थे कि आपका गाना सुनेंगे और नाच भी देखेंगे। बहुत दिनों बाद लड़के की शादी हो रही है बड़ों के घर में।’ सीमा सुहास की ममेरी बहन थी। हफ्ते भर से आई हुई थी लेकिन दीवार के इस पार मिलने तक नहीं आई थी। ‘दीदी, आपके भैया देर से घर आए फिर गोलू की तबीयत भी ठीक नहीं थी इसलिए मैं नहीं आ पाई। पहले अम्मा संभाल लेती थीं अब तो ख़ुद ही सब देखना पड़ता है।’ पानी की बाल्टी लेकर सुरेखा ऊपर आ गई। पूरे दिन मेहमानों के आने का सिलसिला चलता रहा। सुरेखा सुबह से ही नहा-धोकर तैयार होकर काम में लगी रही। मन ही मन इंतज़ार कर रही थी कि शायद रिश्तेदारों में से कोई दीवार के इस ओर भी आकर देख ले। सुलह का कोई बहाना मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सुहास ने आज भी छुट्टी नहीं ली थी। घर पर रहकर परेशान ही होंगे यही सोचकर सुरेखा ने सुहास को रोका नहीं। गोलू ज़िद करता रहा दीवार के दूसरी तरफ़ जाने की, अम्मा के पास जाने की, बुआ के बच्चों के साथ खेलने की, और भी बहुत-सी बातें। सुरेखा ने बड़ी मुश्किल से उसे खेल में लगाया। वह भी चाहती थी कि गोलू अपने चाचा की घोड़ी पर उनके साथ बैठे और सबके आकर्षण का केंद्र बने लेकिन उसके चाचा, बुआ या कम से कम अम्मा को तो उसकी याद आए। अम्मा कैसे इतनी बदल गईं? कुछ महीनों पहले तक गोलू के साथ ही खाना, सोना, बतियाना और घूमना-फिरना होता था उनका। यहां तक कि पीहर भी जातीं तो साथ में लेकर जातीं। सुरेखा से अच्छी तो मोहल्ले में दूसरी बहू ही नहीं आई थी उनके अनुसार। चंद महीनों में सब बदल गया। सच ही तो है कलयुग में सबसे प्यारा रिश्तेदार तो पैसा ही होता है। अपनी औलाद भी बुरी हो जाती है पैसे के सामने। अनुभव यही हो रहा था हर रोज़ लेकिन दिल गवाही नहीं देना चाहता था। ‘तुमने मेरी कमीज़ कहां रख दी है? इतनी देर से ढूंढ रहा हूं।’ सुहास ने कमरे में से आवाज़ लगाई। सुरेखा रसोई से बाहर आकर बोली, ‘मैंने धो दी है। आप नई पहन लीजिए। मेहमान आए हुए हैं घर में।’ सुहास वहीं से बड़बड़ाया, ‘मेहमान तो विकास के घर में आए हैं, मेरे घर में नहीं। मैं क्यूं तैयार होकर बैठूं फालतू में। मुझसे दिखावा नहीं होगा।’ सुरेखा ने दूसरी कमीज़ निकालकर दे दी। ‘मेरी बात मानकर पहन लो। हम उनकी तरह नहीं हो सकते हैं। फिर कोई रिश्तेदार इधर भी तो आ सकता है। क्या सोचेंगे हमें विकास भैया की शादी की ख़ुशी नहीं है।’ सुहास ने कमीज़ पहन ली लेकिन दिल में तूफान उमड़ रहा था। रह-रहकर सारी बातें याद आ रही थीं। सभी घटनाएं चलचित्र की भांति आंखों के सामने घूम रही थीं। एक रात दादाजी पेशाब करने गए तो बिस्तर पर वापिस नहीं आए। दिल का दौरा पड़ने से बाथरूम में ही उन्होंने दम तोड़ दिया था। वह पांच साल की छोटी-सी उम्र में समझ ही नहीं पाया कि उसके दादा बिना उसे बताए कहां चले गए थे? पिता को दादा की नौकरी मिल गई। ज़िम्मेदारियां बढ़ गईं। कई लोग अपने बनकर सामने आए लेकिन हक़ीक़त तब उजागर हुई जब पिता को पीने की बुरी लत लग गई थी। सुहास जब दसवीं में था तब पिता अपना मानसिक संतुलन खो चुके थे। दिन-रात नशे में धुत रहते। मां या दादी दोनों में से कोई कुछ कह देता तो हंगामा खड़ा कर देते। सुहास उनसे नफरत करने लगा था। घर के सभी काम उसे ही करने पड़ते। पिता सुबह ड्यूटी पर जाते और शाम को नशे में धुत होकर वापिस आते। कई बार तो कहीं गिर जाते तो सुहास ही उठाकर घर वापिस लेकर आता। उसका खून खौलने लगता उनकी हरकतों को देखकर। बहुत मुश्किल दिन थे वो। कहने को पिता नौकरी कर रहे थे लेकिन चारों भाई-बहनों का ख़र्च नहीं उठ पा रहा था। इसीलिए सुहास ने दसवीं के बाद डिप्लोमा कोर्स करके इलेक्ट्रीशियन का काम शुरू कर दिया। जल्दी ही शादी भी हो गई। जल्दी शादी होने का एक कारण दो छोटी बहनें भी थी। सुहास की शादी में जो भी सामान आया वो सारा मीता की शादी में काम आ गया। छोटी नीता पढ़ने में तेज़ थी इसलिए सुहास जी-जान से उसकी मदद करता था। पढ़ाई पूरी करके उसने नौकरी शुरू की तब भी पिता से ऊपर होकर उसने उसे दूसरे शहर में जाने दिया। लेकिन थोड़े दिनों बाद ही उसने बिना किसी को बताए अपने एक सहकर्मी से प्रेम विवाह कर लिया। पिता को जैसे ही सूचना मिली, ब्रेन हेमरेज से उनकी जान चली गई। सुहास की तंद्रा भंग हुई। वह डॉक्टर के पास जाने के लिए बस में बैठ गया। दूसरे शहर जाना था। दवाई ख़त्म हो गई थी। उसका मानसिक संतुलन फिर से बिगड़ने लगा था। सुरेखा ने ज़िद करके डॉक्टर के पास भेज दिया था। वहां रहकर रिश्तेदारों के बदले रवैए से वो अवसाद की स्थिति में पहुंच जाता। लेकिन दिल और दिमाग़ की जंग अब भी जारी थी। वर्तमान से छुप गया था परंतु अतीत ने उसे ढूंढ लिया था। एक के बाद दूसरा, तीसरा आघात याद दिला रहा था। पिता के चले जाने के बाद दुकान छोड़कर उनकी नौकरी करनी पड़ी। छोटा भाई अभी वयस्क नहीं था इसलिए ज़िम्मेदारी सुहास को ही निभानी थी। छोटे शहर में अवसर नहीं मिलने से भाई उसकी तरह घर में ही नहीं रह जाए, यही सोचकर उसे पढ़ाई पूरी करने दूसरे शहर में भेज दिया। सुरेखा भी जब से ब्याहकर आई थी, घर की ज़िम्मेदारियों में उसका हाथ बंटा रही थी। कभी किसी चीज़ की फरमाइश नहीं, कभी लड़ाई नहीं न ही कोई शिकायत। उसके जीवन में आया एकमात्र सुखद अहसास। डॉक्टर ने इस बार भी चेतावनी दी, ‘सुहास जीवन के उतार-चढ़ाव को इतनी गंभीरता से लोगे तो कभी ख़ुश नहीं रह पाओगे। घर-परिवार, रिश्तेदार तभी अपने होंगे जब तुम ठीक रहोगे। बीमार व्यक्ति से केवल सहानुभूति ही होती है।’ डॉक्टर के सामने उसकी बात बिलकुल सही लगती लेकिन क्लिनिक से बाहर आते ही फिर से परिस्थितियां हावी हो जातीं और संतुलन बिगड़ जाता। लोग शादी ही क्यों करते हैं अपनी इकलौती लड़कियों की जब दूसरे घर में वो सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकतीं। यही कारण दिया था विकास के सास-ससुर ने। ‘हमारी बेटी किसी दूसरे के अनुसार अपनी ज़िंदगी नहीं जिएगी। हमारा सब कुछ हमारी बेटी का ही है। शादी तभी होगी जब विकास का हिस्सा उसे दे दिया जाएगा।’ विकास तो क्या बोलता मां और मीता ही तैयार बैठे थे उनकी शर्तें मानने को। ‘आज घुड़चढ़ी है विकास भैया की। सुहास तुम जल्दी से कपड़े बदलकर आ जाओ। मैं गोलू को तैयार करती हूं तब तक।’ चाय का कप जैसे ही नीचे रखा सुरेखा की आवाज़ सुनाई दी। ‘सुरेखा, इतना सब कुछ होने पर भी तुम कैसे तैयार हो सकती हो?’ सुहास ने पूछा। सुरेखा ने पास आकर उसे समझाने की कोशिश की,‘विकास आपका भाई है। उसने अपना हिस्सा लिया है। आपका कुछ बुरा नहीं किया है, सुहास। आप समझते क्यों नहीं हो?’ सुहास हैरान था,‘तुम्हें यह दीवार दिखाई नहीं देती है? सुरेखा, कैसे भूल सकती हो सब कुछ? मां ने एक बार भी नहीं कहा कि मेरा होना ज़रूरी है वहां। मीता दस दिन से आई हुई है। मिलने भी नहीं आई मुझसे। मैं इतना महान नहीं हूं। मुझे दुख देता है उनका यह व्यवहार।’ कहते-कहते फिर से उसने अपना सिर पकड़ लिया। सुरेखा की आंखें नम हो गईं, ‘किसी को कैसे समझाऊं कि हमें विकास की शादी की कितनी ख़ुशी है लेकिन चाहकर भी उसे दिखा नहीं सकते हैं।’ सुहास को पैनिक अटैक आ जाने से शादी में कोई नहीं गया। गोलू ज़िद करके रोकर सो गया। पूरे मोहल्ले में, रिश्तेदारों में यही चर्चा हो रही थी कि भाई की शादी में भाई का परिवार ही शामिल नहीं हुआ। नई बहू की मुंह दिखाई हो रही थी। बड़े आदमी की बेटी के सम्मान में कोई कमी न रह जाए पूरा ध्यान रखा जा रहा था। खुसर-पुसर चल रही थी। लेकिन अचानक ही बहू ने एक बात कही और सबके मुंह खुले रह गए। ‘सुहास, बाहर आओ, देखो कौन आया है?’ सुरेखा लगभग चीखकर बोली। सुहास ने देखा विकास अपनी पत्नी के साथ बाहर खड़ा था। पीछे ही मां और मीता भी खड़ी थी। ‘सुहास भाई, छोटी भाभी सबसे पहले आप दोनों से मुंह दिखाई लेंगी, फिर रस्म पूरी होगी।’ सुहास को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने सुरेखा की ओर देखा। वह तो पहले से ही हाथ में देवरानी को देने के लिए उपहार लेकर खड़ी थी। ‘भाई, आप मेरी बात तो नहीं मानोगे लेकिन इसकी बात तो मान लो।’ मीता ने सुहास को देखकर कहा। ‘दीवार आज ही हट जाएगी। कनु को घुटन हो रही है।’ विकास का तर्क था। ‘तुम जैसा चाहते हो, वैसा पहले जैसा हो जाएगा, बस बहू की बात का मान रख लो।’ मां ने भी सफ़ाई दी। ‘कनु, तुम्हारा अपने घर में स्वागत है। विकास का बड़ा भाई हूं लेकिन पिता का फ़र्ज़ निभाया है मैंने उनके जाने के बाद। तुम भी मेरी बेटी जैसी हो। पिता से कैसा पर्दा? घूंघट उठाओ और अपने घर में रहो, सुरेखा के साथ।’ सुरेखा ने कनु को गले से लगा लिया। सभी बैठ गए। सुरेखा के हाथ की चाय पीकर सब उसकी तारीफ़ों के पुल बांधने लगे। ‘मां, अब जैसा है, वैसा ही रहने दो। मैं अब बदलाव स्वीकार कर चुका हूं।’ सुहास ने मां से कहा। ‘लेकिन भैया दीवार तो आज ही गिरेगी। मेरा दम घुटता है, छोटे घर में। फिर आपने तो मुझे बेटी कहा है तो आपका और मेरा तो घर एक ही रहेगा।’ कनु अब तक खुल चुकी थी। ‘तुम्हारा घर तो एक ही है लेकिन विकास भैया का हिस्सा तो उन्हें मिलना ही चाहिए। उनके पापा की निशानी है यह।’ सुरेखा की बात पर सुहास ने भी सहमति जताई। ‘दीवार गिरा दो, लेकिन हिस्सा अब तुम ही रखो विकास, यह तुम्हारा हक़ है। बस मन से दूर मत रहो।’ विकास रोते हुए भाई से लिपट गया। ‘मुझे माफ़ कर दो भाई, मैं भूल गया था कि आपकी अनुमति के बिना इस घर में ख़ुशी आ ही नहीं सकती है। जायदाद सुरक्षा दे सकती है लेकिन ख़ुशी नहीं।’ कई महीनों बाद दोनों भाई मिल रहे थे। मां और मीता अपने आंसू छिपा रही थीं। विकास को अहसास दिलाने का शायद यही रास्ता था।