लोग अक्सर कहा करते हैं कि राज कपूर का बेटा होना, एक आसान जिंदगी का आधार है। कोई भी उनके यहां पैदा होकर स्टार बन सकता है। मैं इस बात से जरा सहमत नहीं हूं। मैं भूखे पेट नहीं सोया, मैंने काम पाने को लेकर स्ट्रगल नहीं किया, लेकिन मेरी दिक्कतें थीं और सबसे अलग थीं। मैं बेहद सफल फिल्म 'बॉबी' से लॉन्च हुआ। इस सफलता से मेरा दिमाग खराब हुआ और मैंने कई मूर्खताएं कीं। इन सब बातों से मैं तब निकला जब मेरी फिल्में असफल हुईं। तब मेरा जिंदगी से सामना हुआ।
दरअसल यह भी मैंने अपने पिता राज कपूर से ही सीखा था। मैं अपनी पहली फिल्म 'मेरा नाम जोकर' को ही मानता हूं। उसकी असफलता या सफलता को समझने के लिए मैं बहुत छोटा था लेकिन मुझे इतना पता लग गया था कि फिल्म फ्लॉप हो गई है। यह कल्ट फिल्म थी, अपने वक्त से आगे की थी। इस पर काफी पैसा लगा था। जब यह फिल्म फ्लॉप हो गई। हम खूब कर्ज में आ गए। घर तो खैर उस वक्त था ही नहीं, वरना वो भी गिरवी रखा होता। कार, स्टूडिओ... सब हमसे छिन गया था। उस वक्त हमारे हालात देखकर हर बड़े कलाकार ने अपनी मदद पापा को ऑफर की थी। चाहे वो राजेश खन्ना हों, या शर्मिला टैगोर... सब मुफ्त में उनके साथ अगली फिल्म करने का तैयार थे।
राज कपूर ऐसे इंसान थे कि वो केवल उस काम को करते थे जिसमें उन्हें यकीन होता था। आप समझिए जिस इंसान की हर चीज गिरवी हो, वो किसी तरह के दबाव में होगा। उन्हें तुरंत ही एक फिल्म बनाना थी, जो इस कर्ज से निकाले। उन्हें कमबैक करना था। उन्हें बैंक के कर्जे उतारना थे। हर गिरवी चीज छुड़ाना थी।
मैंने पहली सफलता के बाद एक के बाद एक तूफान झेले, एंग्री यंग मैन की आंधी ने मुझ जैसे रोमांटिक हीरो को उड़ा ही दिया था। 1970 में जब मैंने इंडस्ट्री में प्रवेश किया तो परदे पर सिर्फ मार-धाड़ देखी जाती थी। अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना जैसे दिग्गज थे। लोग इन्हें ही देखा करते थे। लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। मैं यही बात सबसे कहना चाहूंगा। मैं नहीं उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा, खूब मेहनत की, गंभीरता के साथ, समर्पण के साथ काम करता गया। ऐसा अनिश्चितता का माहौल था कि आज उसकी कल्पना भी मुश्किल है। कोई म्यूजिकल फिल्में देखना ही नहीं चाहता था। ऐसे माहौल में सिर्फ अपने काम पर यकीन करके टिके रहना आसान नहीं था।
ऐसे में उन्होंने वो फिल्म(बॉबी) बनाई, जिसमें उनका यकीन था। उन्होंने एक कॉमिक से प्रभावित होकर युवा फिल्म बनाई। उन्होंने असल टीनएजर्स पर पटकथा लिखी। यह प्यार में पड़ने और प्यार को समझने को लेकर थी। यह कहानी लिखी गई, फिल्म बनी, रिलीज हुई और अपार सफलता इसे मिली। राजकपूर इस फिल्म में किसी भी एक्टर को ले सकते थे लेकिन उन्होंने मुझ पर और डिंपल कपाड़िया जैसे नए-नवेलों पर दांव खेला।
तो यहां समझिए कि जिस पर यकीन हो उस पर टिके रहना कितना जरूरी है। यकीन ही है जो आपसे आपका सर्वश्रेष्ठ निकालता है। हर जगह गणित नहीं चलता। गणित तो नफे-नुकसान का खेल है। सफलता तो यकीन से मिलती है। अपने काम पर यकीन इसलिए जरूरी है और अपने यकीन पर काम करना भी इसीलिए आवश्यक है। जिस पर भी आपको यकीन हो, काम कीजिए... असफल हुए भी तो यह खुशी रहेगी कि आपने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया था।
सफलता का कोई फार्मूला नहीं होता
1. क्रिएटिव दिमाग हमेशा बेचैन रहता है।
2. मैं जब काम कर रहा होता हूं तो मैं अपनी सीनियर्स और जूनियर्स से कुछ ना कुछ सीख रहा होता हूं।
3. मुझे काम पर जाना एक्साइट करता है, काम पर निकलते वक्त मैं उत्साह से भरा होता हूं।
4. किसी भी चीज का कोई फॉर्मूला नहीं है, अपना रास्ता आपको ही बनाना है।
(जनवरी 2017 में चेन्नई के एक इवेंट में मशहूर एक्टर ऋषि कपूर)