आज षटतिला एकादशी संपूर्ण व्रत कथा

त्वरित ख़बरें - माधुरी मंडावी

माघ मास में आने वाली एकादसी को षटलिता एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन तिल खाने का अधिक महत्व होता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को धन धान्य की कोई कमी नहीं रहती है। यहां पढ़ें षट्तिला एकादशी व्रत कथा विस्तार से।

युधिष्ठिर ने पूछा- जगन्नाथ ! श्रीकृष्ण ! आदिदेव ! जगत्पते ! माघ मासके कृष्ण पक्षमै कौन-सी एकादशी होती है ? उसके लिये कैसी विधि है ? तथा उसका फल क्या है ? महाप्राप्न ! कृपा करके ये सब बातें बताइये ।

श्रीभगवान् बोले- नृपश्रेष्ठ ! सुनो, माघ मास के कृष्ण पक्षकी जो एकादशी है, वह 'षट्तिला' के नामसे विख्यात है, जो सब पापों का नाश करने वाली है। अब तुम 'षर्तिला'की पापहारिणी कथा सुनो, जिसे मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यने दाल्भ्य से कहा था। दाल्भ्यने पूछा - ब्रहान् ! मृत्यु लोक में आये हुए प्राणी प्रायः पापकर्म करते हैं। उन्हें नरकमें न जाना पड़े. इसके लिये कौन-सा उपाय है ? बताने की कृपा करें।

पुलस्त्यजी बोले - महाभाग ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है, बतलाता हूं: सुनो। माघ मास आने पर मनुष्य को चाहिये कि वह नहा-धोकर पवित्र हो इन्द्रियों को संयम में रखते हुए काम, क्रोध, अहंकार, लोभ और चुगली आदि बुराइयों को त्याग दे। देवाधिदेव ! भगवान का  स्मरण करके जल से पैर घोकर भूमि पर पड़े हुए गोब रका संग्रह करे। उसमें तिल और कपास छोड़कर एक सौ आठ पिंडिकाएं बनाए। फिर माघ में जब आर्दा या मूल नक्षत्र आये, तब कृष्ण पक्ष की एकादशी करनेके लिये नियम ग्रहण करे। भलीभांति स्नान करके पवित्र हो शुद्धभावसे देवाधिदेव श्रीविष्णु की पूजा करे। कोई भूल हो जानेपर श्रीकृष्ण का नामोच्चारण करे। रात को जागरण और होम करे। चन्दन, अरगजा, कपूर, नैवेद्य आदि सामग्री से शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करे। तत्पश्चात भगवान का स्मरण करके बारम्बार श्रीकृष्ण नाम का उच्चारण करते हुए कुम्हड़े, नारियल अथवा बिजौरके फलसे भगवान को विधिपूर्वक पूजकर अर्घ्य दे। अन्य सब सामग्रियों के अभाव में सौ सुपारियोंके द्वारा भी पूजन और अर्घ्यदान किए जा सकते हैं। अर्घ्य का मन्त्र इस प्रकार है-

कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव। संसारार्णवमनानां प्रसीद पुरुषोत्तम॥ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । सुब्रहाण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज ॥ गृहाणार्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ।

'सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ! आप बड़े दयालु हैं। हम आश्रयहीन जीवों के आप आश्रयदाता होइये। पुरुषोत्तम ! हम संसार-समुद्र मे डूब रहे है, आप हमपर प्रसत्र होइये। कमलनयन ! आपको नमस्कार है, विश्वभावन ! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य ! महापुरुष ! सबके पूर्वज ! आपको नमस्कार है।

जगत्पते ! आप लक्ष्मीजी के साथ मेरा दिया हुआ अर्थ स्वीकार करें।'

तत्पश्चात् ब्राह्मण की पूजा करे। उसे जल का बड़ा दान करे। साथ ही छाता, जूता और वस्त्र भी दे। दान करते समय ऐसा कहे - 'इस दान के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों।' अपनी शक्ति के अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मण को काली गौ दान करे। द्विजश्रेष्ठ ! विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह तिल से भरा हुआ पात्र भी दान करे। उन तिलों के बोने पर उनसे जितनी शाखाएं पैदा हो सकती है, उतने हजार वर्षी तक वह स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित होता है। तिलसे स्नान करे, तिलका उबटन लगाये, तिल से होम करे; तिल मिलाया हुआ जल पिये, तिल का दान करे और तिल को भोजन के काम में ले। इस प्रकार छः कामों में तिल का उपयोग करने से यह एकादशी 'षट्तिला' कहलाती है, जो सब पापों का नाश करने वाली है।