1 जुलाई 2022
राजनांदगांव। जिला भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के जिला अध्यक्ष व पार्षद दल के प्रवक्ता शिव वर्मा ने भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की बधाई देते हुए कहा की भगवान जगन्नाथ आप सब के मनोकामना पूर्ण करें। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार लाडली बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों कृष्ण और बलराम से नगर देखने की इच्छा जताई थी। तब दोनों भाई अपनी प्यारी बहन को रथ में बैठाकर नगर भ्रमण के लिए ले गए थे। रास्ते में तीनों अपनी मौसी के घर गुंडिचा भी गए और यहां पर 7 दिन तक रुके और उसके बाद नगर यात्रा को पूरा करके वापस पुरी लौटे। कहते हैं कि तभी से यहां पर हर साल रथ यात्रा निकालने की परंपरा का आरंभ हुआ था। रथ से जुड़ी कुछ और भी खास बातें और परंपराएं आज हम आपको बताने जा रहे हैं। यात्रा की तैयारी और इसके निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से ही शुरू हो जाता है। ये सभी रथ नीम की परिपक्व और पकी हुई लकड़ी से तैयार किए जाते हैं। इसे दारु कहा जाता है। रथ को बनाने में केवल लकड़ी को छोड़कर किसी अन्य चीज का प्रयोग नहीं किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ में कुल 16 पहिए होते हैं और यह बाकी दोनों रथों से बड़ा भी होता है।
श्री वर्मा ने आगे कहा कि जगन्नाथ रथ यात्रा के तीनों रथों को बनाने में एक भी कील का प्रयोग नहीं किय जाता है और न ही किसी धातु का प्रयोग होता है। यह रथ पूरी तरह से केवल नीम की लकड़ी का होता है। रथ बनाने के लिए लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन होता है और रथ को बनाने का काम अक्षय तृतीया के दिन से शुरू किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष सबसे ऊंचा 45.6 फीट का, उसके बाद बलरामजी का रथ तालध्वज रथ 45 फीट का और उसके बाद बहन सुभद्रा का रथ दर्पदलन 44.6 फीट का होता है। तीनों रथों का रंग भी अलग-अलग होता है। तालध्वज रथ का रंग लाल और हरा होता है। दर्पदलन काले और लाल रंग का होता है। वहीं नंदीघोष पीले और लाल रंग का होता है। जब तीनों रथ यात्रा के लिए सजसंवरकर तैयार हो जाते हैं तो फिर पुरी के राजा गजपति की पालकी आती है और फिर रथों की पूजा की जाती है। इस पूजा को पारंपरिक भाषा में छर पहनरा कहा जाता है। उसके बाद सोने की झाड़ू से रथ मंडप और रथ यात्रा के रास्ते को साफ किया जाता है।