जमीन का फर्जीवाड़ा : सरकारी जमीन बेची बिल्डर

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 28  मई 2022 

डूंडा के पास कमल विहार और उससे सटी सरकारी जमीन को बिल्डर ने 10 साल पहले बेच दी। लोगों ने वहां मकान बनाकर कॉलोनी बसा ली। इस दौरान न तो आरडीए के अफसरों को भनक लगी न जिला प्रशासन के अधिकारियों को। अफसरों को अब कब्जे का पता चला। जानकारी होते ही शुक्रवार को आनन-फानन में अफसर तोड़फोड़ दस्ता लेकर वहां कब्जा हटाने पहुंच गए, लेकिन पक्के मकान देखकर हैरान रह गए। सरकारी जमीन पर बसी कालोनी में दो-दो मंजिला मकान बनाकर लोग रहने लगे हैं। अफसरों को तोड़फोड़ कार्रवाई रोकनी पड़ी।

जांच से पता चला कि बिल्डर की 75 हजार वर्गफुट जमीन कमल विहार में और उसी से सटी 50 हजार वर्गफुट जमीन है। इन दोनों जमीनों को कब्जे में ले लिया गया है। बाकी जिस जमीन पर कालोनी बस चुकी है, उसे खाली कराने को लेकर मंथन किया जा रहा है। रायपुर विकास प्राधिकरण ने 2010 में टीडीएस-4 (टाउन डेवलपमेंट स्कीम) के तहत कमल विहार योजना शुरू की थी।

उसी दौरान अलास्का इंफ्रास्ट्रक्चर की कालोनी भी वहां बसायी गई। प्लाटिंग के दौरान बिल्डर ने आरडीए और उसी से सटी सरकारी जमीन को कब्जे में लेकर अपनी कालोनी में शामिल कर लिया। आरडीए के चीफ इंजीनियर अनिल गुप्ता ने बताया शुक्रवार को नापझोंक से पता चला कि सरकारी और आरडीए दोनों की जमीन पर कब्जा कर वहां कालोनी बसा दी गई है।

इसके लिए लैंड पुलिंग योजना के तहत लोगों से उनकी जमीन ली गई। प्रोजेक्ट के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन को भी शामिल किया गया। कमल विहार का प्राेजेक्ट लांच होते ही उसके आसपास बड़ी संख्या में प्लाटिंग हो ने लगी और देखते ही देखते कई कालोनियां बस गईं।

15 करोड़ की जमीन, कैसे हो गया खेल?
सरकारी जमीन पर कब्जा फिर उस पर कालोनी बनाना उसके बाद प्लाटिंग कर बेचना सबकुछ अचानक और रातों रात नहीं हुुआ है। सरकारी जमीन पर कब्जा का यह खेल पिछले पांच-सात साल से या उससे भी पहले यहां चल रहा है। इतने वर्षों के बाद भी अफसरों को इसकी जानकारी नहीं होना बड़ी बात है। इस पूरे खेल में सरकारी सिस्टम की भी भूमिका जांच के घेरे में है। आरडीए के संचालक राजेंद्र पप्पू बंजारे का कहना है कि ये जमीन लगभग 15 करोड़ की है।

जमीन हमारी, गलती से आरडीए का नाम चढ़ा: बिल्डर
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अलास्का इंफ्रास्ट्रक्चर के डायरेक्टर हरजीत छाबड़ा का कहना है हमने 2008 में कालोनी के लिए टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से ले आउट पास कराया। 2010 में कमल विहार शुरू हुआ। पटवारी, तहसीलदार की एनओसी और अन्य सभी औपचारिकताओं के बाद कालोनी स्वीकृत हुई और उसके बाद हमने प्लाटिंग कर बेचा। लोगों ने बैंक से लोन पास कराए। कागजों में गलती होती तो यह सब कैसे संभव होता? कुछ त्रुटि की वजह से खसरे में गलत नाम चढ़ गया है। इस मामले में एसडीएम के यहां स्टे के लिए आवेदन दिया गया है।

मकान बनाने वालों की गलती नहीं, बिल्डर की जमीन को कब्जे में लेंगे
आरडीए और जिला प्रशासन के अफसरों का मानना है कि वहां प्लाॅट खरीदकर मकान बनाने वालों की इसमें गलती नहीं है। उन्हें भ्रम में रखा गया है। इस वजह से तुरंत तोड़फोड़ की कार्रवाई नहीं की गई। जांच में पता चला है कि बिल्डर की लगभग सवा लाख वर्गफीट जमीन अभी भी बिल्डर के पास है। बिल्डर की खाली जमीन से ही कब्जे की भरपाई पर विचार किया जा रहा है। लैंड पुलिंग के तहत बिल्डर की जमीन को भी कमल विहार में लिया गया है। इसके बदले में 35 फीसदी डेवलप प्लाॅट बिल्डर को लौटाना है।

कब्जे वाली जमीन की भरपाई के लिए 35 फीसदी डेवलप भी बिल्डर को नहीं दिए जाएंगे। जितनी जमीन पर कब्जा किया गया है, उसकी भरपाई के बाद ही बिल्डर को उसकी जमीन दी जाएगी। अफसरों का कहना है कि फिलहाल वहां मकान बना चुके लोगों को किसी तरह से डरने की जरूरत नहीं है। उनकी जमीन या बने हुए मकानों को नहीं लिया जाएगा।